राजनीति

अफगानिस्तान में अमन मुमकिन?अमेरिका ने अफगानिस्तान में शांति समझौता कराने में अपनी ताकत झोंकी है। उसका मकसद अमेरिकी सैनिकों को वापस घर लाने के लायक स्थिति बनाना है। मगर भारत ने उसे तालिबान के साथ हड़बड़ी में शांति संधि करने पर चेतावनी दी है। भारत का कहना है कि तालिबान के साथ किसी भी संधि में अफगानिस्तान की मौजूदा राजनीतिक और संवैधानिक संरचना की सुरक्षा होनी चाहिए। भारत चुनाव से पहले किसी अंतरिम सरकार के गठन के पक्ष में नहीं है। भारत ने ये बातें अमेरिकी दूत जालमाय खालिदजाद को उनके नई दिल्ली दौरे पर कही। अफगान सरकार और तालिबान के बीच बातचीत पर सालों तक जोर देते रहने के बाद अमेरिका ने सितंबर में खालिदजाद को अफगान दूत नियुक्त किया था। उसके फौरन बाद उन्हृोंने विद्रोहियों से बातचीत शुरू कर दी जो अफगान सरकार को अमेरिका की कठपुतली बताते हैं। लेकिन बहुत से विश्लेषकों को डर है कि नाटो सैनिकों की पूरी वापसी के बाद अफगानिस्तान की कमजोर और भ्रष्ट सरकार चरमरा पर गिर सकती है या नए गृहयुद्ध की शुरुआत हो सकती है। विश्लेषकों का कहना है कि तालिबान ताकतवर होकर वार्ता की मेज पर आया है। उसने देश के करीब आधे हिस्से पर नियंत्रण स्थापित कर लिया है। अब समझा यह जा रहा है कि दोनों पक्ष सहमति की ओर बढ़ रहे हैं, जिसके तहत आतंकवादी हमलों के लिए इस्तेमाल न होने के तालिबान के वादे के एवज में अमेरिका अफगानिस्तान से वापस हट जाएगा। अफगानिस्तान की मौजूदा सरकार नस्लीय और गुटों के आधार पर विभाजित है। उसकी सत्ता मुख्य रूप से शहरों में केंद्रित है, जबकि देहाती इलाकों में व्यापक रूप से तालिबान का वर्चस्व है। अमेरिका और नाटो ने 2014 में अपनी लड़ाकू भूमिका खत्म करने की घोषणा की थी, लेकिन अभी भी वह अफगान सेना को हवाई और रणनीतिक समर्थन दे रही है। अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी देश में अंतरिम सरकार बनाने के सख्त खिलाफ हैं। मगर इस समय चल रही बातचीत में उन्हें दरकिनार कर दिया गया है। अफगानिस्तान दशकों से युद्ध का सामना कर रहा है। हालांकि पिछली वार्ताओं में अमेरिका और तालिबान दोनों ने ही अहम प्रगति की बात की है, लेकिन अभी तक कोई समझौता नहीं हुआ है। ये कहना जल्दबाजी होगी कि क्या तालिबान दूसरे हथियारबंद गुटों पर कार्रवाई करने का इच्छुक है और इसमें समर्थ भी है। बहरहाल, ताजा अमेरिकी रुख भारत के लिए एक चुनौती है। बेहतर होगा कि भारत जल्द-से-जल्द अपनी स्पष्ट अफगान नीति घोषित करे।

अमेरिका ने अफगानिस्तान में शांति समझौता कराने में अपनी ताकत झोंकी है। उसका मकसद अमेरिकी सैनिकों को वापस घर लाने के लायक स्थिति बनाना है। मगर भारत ने उसे तालिबान के साथ हड़बड़ी में शांति संधि करने पर चेतावनी दी है। भारत का कहना है कि तालिबान के साथ किसी भी संधि में अफगानिस्तान की मौजूदा राजनीतिक और संवैधानिक संरचना की सुरक्षा होनी चाहिए। भारत चुनाव से पहले किसी अंतरिम सरकार के गठन के पक्ष में नहीं है। भारत ने ये बातें अमेरिकी दूत जालमाय खालिदजाद को उनके नई दिल्ली दौरे पर कही। अफगान सरकार और तालिबान के बीच बातचीत पर सालों तक जोर देते रहने के बाद अमेरिका ने सितंबर में खालिदजाद को अफगान दूत नियुक्त किया था। उसके फौरन बाद उन्हृोंने विद्रोहियों से बातचीत शुरू कर दी जो अफगान सरकार को अमेरिका की कठपुतली बताते हैं। लेकिन बहुत से विश्लेषकों को डर है कि नाटो सैनिकों की पूरी वापसी के बाद अफगानिस्तान की कमजोर और भ्रष्ट सरकार चरमरा पर गिर सकती है या नए गृहयुद्ध की शुरुआत हो सकती है। विश्लेषकों का कहना है कि तालिबान ताकतवर होकर वार्ता की मेज पर आया है। उसने देश के करीब आधे हिस्से पर नियंत्रण स्थापित कर लिया है। अब समझा यह जा रहा है कि दोनों पक्ष सहमति की ओर बढ़ रहे हैं, जिसके तहत आतंकवादी हमलों के लिए इस्तेमाल न होने के तालिबान के वादे के एवज में अमेरिका अफगानिस्तान से वापस हट जाएगा। अफगानिस्तान की मौजूदा सरकार नस्लीय और गुटों के आधार पर विभाजित है।
उसकी सत्ता मुख्य रूप से शहरों में केंद्रित है, जबकि देहाती इलाकों में व्यापक रूप से तालिबान का वर्चस्व है। अमेरिका और नाटो ने 2014 में अपनी लड़ाकू भूमिका खत्म करने की घोषणा की थी, लेकिन अभी भी वह अफगान सेना को हवाई और रणनीतिक समर्थन दे रही है। अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी देश में अंतरिम सरकार बनाने के सख्त खिलाफ हैं। मगर इस समय चल रही बातचीत में उन्हें दरकिनार कर दिया गया है। अफगानिस्तान दशकों से युद्ध का सामना कर रहा है। हालांकि पिछली वार्ताओं में अमेरिका और तालिबान दोनों ने ही अहम प्रगति की बात की है, लेकिन अभी तक कोई समझौता नहीं हुआ है। ये कहना जल्दबाजी होगी कि क्या तालिबान दूसरे हथियारबंद गुटों पर कार्रवाई करने का इच्छुक है और इसमें समर्थ भी है। बहरहाल, ताजा अमेरिकी रुख भारत के लिए एक चुनौती है। बेहतर होगा कि भारत जल्द-से-जल्द अपनी स्पष्ट अफगान नीति घोषित करे।

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