साक्षात्कार

कांटों से भरी राजस्थान में भाजपा की डगर, सत्ता बचाने में लगी

राजस्थान में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। चुनाव की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आ रही है, वैसे-वैसे सियासी सरगर्मी तेज होती जा रही हैं। राजनीतिक दलों ने कमर कसने के साथ ही जोरों-शोरों से चुनावी तैयारियों को अंजाम देना शुरू कर दिया हैं। राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता अपने प्रतिनिधियों के साथ मतदाताओं के घर-घर जाकर संपर्क करके प्रचार करने के साथ ही जगह-जगह पर आम सभाओं को आयोजित कर जनता को संबोधित भी करते नजर आ रहे हैं। पेम्पलेट बांटने, रेडियो चलवाने से लेकर बड़े-बड़े होर्डिंग लगाकर राजनीतिक दल जन सामान्य का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं। वहीं आम जनता में भी चुनाव को लेकर खासा उत्साह देखने को मिल रहा हैं। चाय की थड़ी, नुक्कड़, चौपाल, नाई की दुकान से लेकर होटल, बस स्टैंड, पार्क सहित समस्त सार्वजनिक स्थलों पर एकत्रित होते आम लोगों की जुबान पर चुनाव की चर्चा का ही राग-आलाप सुनाई दे रहा हैं। वहीं राजनीतिक दलों के भीतर टिकट वितरण का कार्य थम चुका है। पार्टी से टिकट नहीं मिलने को लेकर नाराज कई कार्यकर्ताओं व नेताओं ने इस्तीफा व दल-बदल का रास्ता अख्तियार कर लिया है। बहरहाल, सूबे में सत्ता की कुर्सी के लिए सियासी घमासान अपने पूरे उफान पर है और राजस्थान के रण में विजय परचम लहराने के लिए दोनों ही दल तैयार दिखाई दे रहे हैं।
गौरतलब है कि क्षेत्रफल की दृष्टि देश के सबसे बड़े राज्य राजस्थान में एक ही चरण में इस माह की सात तारीख को मतदान होने वाला है और मतों की गिनती ग्यारह दिसंबर को होने वाली हैं। वर्तमान में राजस्थान में 33 जिले हैं, जिनमें कुल 200 विधानसभा सीटें हैं। इनमें 142 सीटें सामान्य के लिए, 33 सीटें अनुसूचित जाति के लिए और 25 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। राजस्थान की 200 सदस्यीय विधानसभा में सत्तारूढ़ भाजपा के पास 163 और कांग्रेस तथा अन्य के पास 37 सीटें हैं। मौजूदा वक्त में यहां बीजेपी सत्ता में है और वसुंधरा राजे सिंधिया सूबे की मुख्यमंत्री हैं। यहां पिछला चुनाव दिसंबर 2013 में हुआ था और मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल 20 जनवरी 2019 को खत्म हो रहा है। सियासी हालात की बात करें, तो 1993 में एक साल के राष्ट्रपति शासन से उबरे राजस्थान में बीजेपी की सरकार बनी थी। तब से अब तक पांच बार चुनाव हो चुके हैं और हर पांच साल में जनता बीजेपी को कांग्रेस से और कांग्रेस को बीजेपी से बदलती रही है। पिछला चुनाव भाजपा जीती थी लेकिन इस बार वसुंधरा राजे के विरोध के चलते भाजपा के लिए जीत की राह आसान नहीं लग रही है।
दरअसल, राजस्थान में वसुंधरा राजे बीजेपी का इकलौता चेहरा हैं। बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष मदन लाल सैनी भी इन्हीं के खेमे के हैं। हालांकि, पार्टी में ओम माथुर, भूपेंद्र यादव जैसे कई दिग्गज नेता हैं, लेकिन इनके पास जनाधार नहीं है। जिसका फायदा वसुंधरा के पक्ष में जाता है। इस बात को इससे भी बखूबी समझा जा सकता है कि 2008 के विधानसभा चुनाव में संघ के हाथ हटा लेने के बाद भी वसुंधरा राजे अपने दम पर 78 सीटें जीतने में कामयाब रही थीं। वसुंधरा का नाम लेने की एक और बड़ी वजह यह बताई जा रही है कि, राजस्थान में बीजेपी के 80 प्रतिशत विधायक वसुंधरा के खेमे के हैं, जो उनके अंधभक्त हैं। ये सभी उनके एक इशारे पर कोई भी कदम उठाने को राजी हैं। ऐसे में पार्टी आलाकमान को उनके नाम पर मुहर लगानी पड़ी।
राजस्थान में विधानसभा चुनाव से पहले आए दो ओपिनियन पोल्स के आंकड़े अनुमान लगा रहे हैं कि कांग्रेस बीजेपी को सत्ता से बेदखल कर देगी। एबीपी न्यूज-सी वोटर और सी-फोर के सर्वेज में 200 विधानसभा सीटों वाले राजस्थान में कांग्रेस को क्रमशः 142 और 124-138 सीटें मिल रही हैं। दोनों ही सर्वे में कांग्रेस को करीब 50 प्रतिशत वोट मिलते दिख रहे हैं, जबकि मुख्यमंत्री पद के लिए कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट की रेटिंग सूबे की मौजूदा मुखिया वसुंधरा राजे सिंधिया से आगे है। एबीपी न्यूज-सी वोटर के सर्वे में राजस्थान में कांग्रेस को 49.9 प्रतिशत और बीजेपी को 34.3 प्रतिशत वोट मिलते दिख रहे हैं। सी-फोर के सर्वे में राजस्थान में कांग्रेस को 50 प्रतिशत और बीजेपी को 43 प्रतिशत वोट मिलते दिख रहे हैं। सी-फोर ने सिर्फ राजस्थान में ही सर्वे किया है, जबकि एबीपी न्यूज-सी वोटर ने मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी सर्वे किया है। इन दोनों राज्यों में बीजेपी 15 वर्षों से सत्ता में है और सर्वे में इन दोनों राज्यों में कांग्रेस बढ़त बनाती दिख रही है। सर्वे के मुताबिक वोट प्रतिशत में मामूली अंतर भी बीजेपी और कांग्रेस में से किसी के हक में फैसला मोड़ सकता है। दोनों को मिल रहे संभावित वोट प्रतिशत में बहुत ही कम अंतर है। सर्वे के मुताबिक राजस्थान में 36 प्रतिशत लोग सचिन पायलट को मुख्यमंत्री देखना चाहते हैं, जबकि 27 प्रतिशत लोग वसुंधरा को सीएम देखना चाहते हैं। इनके अलावा राजस्थान में कांग्रेस के दिग्गज नेता अशोक गहलोत के खाते में 24 प्रतिशत मतदाता हैं। सी-फोर के सर्वे में पायलट, गहलोत और राजे को क्रमशः 32, 27 और 23 प्रतिशत वोट मिले।
सूबे की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की लोकप्रियता तेजी से गिरी है। उनकी कार्यशैली से अपनी पार्टी के ही कार्यकर्ता खुश नहीं हैं। वहीं राजपूत समाज वसुंधरा राजे से नाखुश है। जबकि राजपूत समाज का वोट बैंक जनसंघ के दिनों से भाजपा का परंपरागत वोट बैंक माना जाता रहा है। लेकिन, हाल में विधायक व पूर्व केंद्रीय मंत्री व राजपूत नेता जसवंत सिंह के बेटे, मानवेंद्र सिंह का कांग्रेस का दामन थामने के चलते भाजपा की तकलीफें ओर भी बढ गई। वहीं पार्टी के ऐसे कई वाकयों के कारण राजपूत समाज को धक्का पहुंचा है। जिसमें राजमहल भूमि विवाद, पद्मावती विवाद, गैंगस्टर आनंदपाल सिंह का एनकाउंटर तथा गजेंद्रसिंह शेखावत का राजे द्वारा विरोध मौटे तौर पर शामिल है। इधर, गुर्जर समाज की वसुंधरा से नाराजगी लंबे अर्से से रही है। वहीं राज्य का अधिकांश आम मतदाता खुद मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की कार्यशैली से नाखुश है। आम लोगों का कहना है कि सरकार ने आमजन से कई वादे किए थे जिसके फलस्वरूप लोगों को सरकार से कई उम्मीदें थी लेकिन सरकार जनता की कसौटी पर खरी नहीं उतरी। वहीं बेरोजगारी ने युवाओं को झकझोर दिया है, सरकार ने वादा किया था कि वह हर वर्ष लाखों की तादाद में बेरोजगारों को नौकरी देगी लेकिन बेरोजगारी दिन प्रतिदिन और ज्यादा बढ़ती ही जा रही है। लोगों का कहना है कि भाजपा सरकार भी वही कर रही है जो अन्य सरकारें चुनाव से पहले लोगों को राहत देने के बहाने अपनी ओर आकर्षित करने का काम करती है। ऐसी परिस्थितियों में भाजपा क्या वापस वसुंधरा राजे के नेतृत्व में राजस्थान में सरकार बना पाएगी?

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