राजनीति

कानून के जरिए राजनीति की सफाई!

सुप्रीम कोर्ट ने दागी सांसदों और विधायकों के मामले में एक बड़ा अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने सांसदों, विधायकों और पूर्व सांसदों व विधायकों के आपराधिक मामलों की जल्दी सुनवाई का निर्देश देते हुए केरल और बिहार के हर जिले में विशेष अदालत बनाने का आदेश दिया है। इतना ही नहीं सर्वोच्च अदालत ने दोनों राज्यों की उच्च अदालतों से यह भी कहा है कि अगले दस दिन में वे इस आदेश के अनुपालन की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में पेश करें।
इसका मतलब है कि इन दोनों राज्यों के सभी जिलों में अगले दस दिन में विशेष अदालतें बन जाएंगी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश का दूसरा अहम पहलू यह है कि अदालत ने नेताओं पर दर्ज गंभीर मामलों की सुनवाई पहले करने का आदेश दिया है। यानी कोई गंभीर अपराध जैसे हत्या, अपहरण, बलात्कार, रिश्वतखोरी आदि का आरोप है तो पहले उसकी जांच की जाए।
यह आदेश बहुत अहम है। क्योंकि कुछ समय पहले देश के अलग अलग राज्यों में एक-डेढ़ दर्जन विशेष अदालतें बनीं थीं, पर उनमें सिर्फ राजनीतिक मामलों की सुनवाई हो रही थी। चुनाव आचार संहिता से जुड़े या निषेधाज्ञा आदि के उल्लंघन के मामले सुने जा रहे थे और उनका निपटारा हो रहा था। अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ज्यादा विशेष अदालतें बन जाएंगे और गंभीर मामलों की सुनवाई पहले होगी। पर सवाल है कि क्या इससे राजनीति की सफाई हो जाएगी या इसके साथ साथ कुछ राजनीतिक पहल और करनी होगी?
सांसदों, विधायकों या पूर्व सांसदों, विधायकों पर दर्ज मामलों की जल्दी सुनवाई करके उनके सजा सुना देने से राजनीतिक व्यवस्था से दागी नेता बाहर हो जाएंगे या राजनीति साफ-सुथरी हो जाएगी, यह मानना भोलापन होगा। इसकी कोई संभावना नहीं है कि दागी नेताओं को सजा हो जाने के बाद वे राजनीति से दूर हो जाएंगे। लालू प्रसाद इसकी मिसाल हैं। उनको चारा घोटाले से जुड़े कई मामलों में सजा हो गई है। वे जेल में हैं, पर राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और पार्टी से जुड़े अहम फैसले वे जेल में बैठ करते हैं। उनकी जगह राजनीति की कमान उनकी पत्नी, बेटे और बेटियां संभाल रही हैं।
इसे और बेहतर तरीके से समझना है तो झारखंड में इस साल हुए उपचुनावों को देख सकते हैं। इस साल झारखंड विधानसभा की दो सीटों – सिल्ली और गोमिया के विधायकों क्रमशः अमित महतो और योगेंद्र महतो को आपराधिक मामलों में सजा हो गई, जिसके बाद उनकी सीटें खाली हो गईं। इन दोनों सीटों पर झारखंड मुक्ति मोर्चा ने दोनों दोषी ठहराए गए नेताओं की पत्नियों को टिकट दिया और दोनों जीत भी गए।
इसी तरह झारखंड की ही कोलेबिरा सीट के विधायक एनोस एक्का को हत्या के मामले में सजा हुई है और उनकी सीट पर उपचुनाव हो रहा है तो उनकी पत्नी चुनाव लड़ रही हैं। और हो सकता है कि वे भी जीत जाएं। सो, किसी नेता को सजा होने से वह निजी तौर पर विधायक या सांसद बनने से वंचित हो जाता है पर प्रॉक्सी के जरिए राजनीति पर अपनी पकड़ बनाए रखता है।
देश भर की अदालतों में सांसदों, विधायकों और पूर्व सांसदों, विधायकों के खिलाफ चार हजार से ज्यादा मामले लंबित हैं। बहुत से मामले तो तीन दशक पुराने हैं। कुछ मामलों में सालों गुजर जाने के बाद भी आरोपपत्र नहीं दायर किया जा सका है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इन मामलों में जल्दी सुनवाई हो जाएगी और फैसला भी आ जाएगा। इसका तात्कालिक असर यह होगा कि कुछ बड़े नेता हो सकता है कि चुनाव लड़ने से वंचित हो जाएं पर वे राजनीति से बाहर नहीं होंगे।
कोई डेढ़ दशक पहले चुनाव आयोग ने उम्मीदवारों से आपराधिक रिकार्ड का ब्योरा मंगाना शुरू किया था। उसका मकसद यह था कि इससे दागी उम्मीदवारों की संख्या कम होगी और लोग भी समझदारी से अपना जन प्रतिनिधित्व चुनेंगे। पर उसका कोई गुणात्मक असर होने की रिपोर्ट नहीं है। उसी तरह यह फैसला भी गुणात्मक असर डालेगा इसकी संभावना कम है। राजनीति साफ सुथरी बने, इसके लिए राजनीतिक पहल की असरदार साबित होगी।
जब तक राजनीतिक पार्टी नहीं तय करेंगी कि वे आपराधिक छवि के नेताओं के उनके रिश्तेदारों को टिकट नहीं देंगी, तब तक राजनीति की साफ सफाई नहीं होने वाली है। पर उसमें पार्टियों के सामने मुश्किल यह होती है कि बड़े आर्थिक घोटालों के आरोपी या हत्या, अपहरण आदि के आरोपी नेता बहुत प्रभावशाली होते हैं उनमें चुनाव जीतने की क्षमता होती है। इसलिए पार्टियां उनको तरजीह देती हैं।
अगर पार्टियां प्रॉक्सी के जरिए उनको राजनीति में बने रहने की इजाजत नहीं देती हैं तो वे अपनी पार्टी बना कर या निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरते हैं या अपने करीबी रिश्तेदार को उतारते हैं। उत्तर प्रदेश में मुख्तार अंसारी और उनका परिवार इसकी है। हर राज्य में ऐसे बड़े नेता हैं। सो, एक समग्र रणनीति बनानी होगी, जिसमें राजनीतिक पार्टियां साफ सफाई के लिए प्रतिबद्ध हों और कानूनी रूप से अपराधियों को पार्टी बनाने, चलाने से रोका जाए।

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