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कानून के मुताबिक फैसला – Rashtriya Pyara
राजनीति

कानून के मुताबिक फैसला

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सुप्रीम कोर्ट ने आधुनिक कानून की भावना के मुताबिक निर्णय दिया है। कोर्ट के पांच जजों की संविधान पीठ ने कहा कि उम्मीदवारों को केवल इस आधार पर अयोग्य घोषित नहीं किया जा सकताकि उनके खिलाफ आपराधिक मामले में आरोप तय हो  गए हैं। कोर्ट ने भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जेएम लिंगदोह और गैर-सरकारी संस्था पब्लिक इंटरेस्ट फाउंडेशन की जनहित याचिका पर ये फैसला दिया। पांच जजों की संविधान बेंच ये भी कहा कि चुनाव लड़ने से पहले प्रत्येक उम्मीदवार को अपना आपराधिक रिकॉर्ड निर्वाचन आयोग के समक्ष घोषित करना होगा। नागरिकों को अपने उम्मीदवारों का रिकॉर्ड जानने का अधिकार है। 2011 में दायर अपनी याचिका में गैर-सरकारी संस्था ने मांग की थी कि राजनीति के आपराधीकरण से बचने के लिए एक दिशा-निर्देश तैयार किया जाना चाहिए।

जो भी उम्मीदवार गंभीर मामलों में आरोपी हैं, उन्हें चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए। शुरुआत में ये मामला तीन जजों की बेंच के पास गया था, जिनको ये देखना था कि क्या अनुच्छेद 102(ए) से (डी) और अनुच्छेद 120 (ई) के तहत संसद के बनाए गए कानून के दायरे से बाहर निकलकर कोर्ट किसी को अयोग्य घोषित कर सकता है या नहीं। केंद्र सरकार ने इस मामले में कोर्ट से कहा था कि जो सवाल तीन जजों की बेंच के सामने रखा गया, उसका जवाब मनोज नरूला बनाम भारत संघ मामले में पांच जजों की संविधान पीठ दे चुकी है। मगर कोर्ट इस बात से संतुष्ट नहीं हुआ। उसने फिर इस मामले को पांच जजों की संविधान पीठ का गठन किया। इससे पहले राजनीति के अापराधीकरण को ‘सड़न’ करार देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वह चुनाव आयोग को राजनीतिक पार्टियों से यह कहने का निर्देश देने पर विचार कर सकता है कि उनके सदस्य अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों का खुलासा करें, ताकि मतदाता उनके बारे में जान सकें।

अपने फैसले में कोर्ट ने कहा कि राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों के संबंध में सभी जानकारी अपनी वेबसाइटों पर डालेंगे। याचिकाकर्ताओं ने गुजारिश की थी कि जिन उम्मीदवारों के खिलाफ गंभीर आरोप हैं, उन्हें चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित किया जाए। इस पर कोर्ट ने संसद को निर्देश दिया कि वह ऐसा कानून बनाए जिससे राजनीति में आपराधीकरण को रोका जा सके। कोर्ट ने कहा कि कानून बनाना संसद का काम है। स्पष्टतः कोर्ट ने अपनी भावना बताई, मगर फैसला संविधान की भावना के अनुरूप दिया।

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