राजनीति

चिटफंड की जांच या राजनीतिक दांवपेंच?

पश्चिम बंगाल और ओड़िसा की चिटफंड कंपनियों की जांच सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हो रही है। आधा दर्जन से ज्यादा चिटफंड कंपनियों के ऊपर आरोप है कि उन्होंने लाखों गरीब और मध्यमवर्गीय लोगों को हजारों करोड़ रुपए का चूना लगाया। सारदा चिटफंड, रोजवैली, समृद्धि जैसी कई कंपनियां जांच के दायरे में हैं। कई कंपनियों के मालिक जेल में बंद हैं। पर बरसों से चल रही इनकी जांच निकट भविष्य में किसी नतीजे पर पहुंचती नहीं दिख रही है। कई बरसों से मामला अभी जांच की स्टेज में ही है और अदालत तक नहीं पहुंचा है।

असल में जांच के बहाने ऐसा लग रहा है कि लोगों को फंसाने और इसमें से निकालने का खेल चल रहा है। कुछ लोगों के बचाया जा रहा है को कुछ लोगों फंसाया जा रहा है। कुछ लोगों के खिलाफ जांच शिथिल कर दी गई, आरोपपत्र में नहीं डाला गया या गवाह बना दिया गया तो कुछ लोगों की गर्दन पर तलवार लटका दी गई। सवाल है कि ऐसी जांच से अंत में क्या निकलेगा?

ऐसा नहीं है कि सिर्फ चिटफंड के मामले में ऐसा किया जा रहा है। कई और मामलों में भी यह कहानी दोहराई जा रही है। केंद्रीय एजेंसियां ऐसा लग रहा है कि नेताओं, अधिकारियों के राजनीतिक रूझान को देख कर उनको या तो बचा रही हैं या फंसा रही हैं। पश्चिम बंगाल और ओड़िशा से लेकर उत्तर प्रदेश, बिहार, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश सभी राज्यों में यह खेल चल रहा है।

सारदा और रोजवैली चिटफंड मामले में पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के कई नेताओं पर गाज गिर चुकी है। राज्य सरकार के मंत्री रहे मदन मित्रा, सांसद तपस पाल और कुणाल घोष, लोकसभा में पार्टी के नेता सुदीप बंदोपाध्याय जैसे कई बड़े नेता इसकी जांच के दायरे में आए। इनकी गिरफ्तारी भी हुई और लंबी पूछताछ हुई। तृणमूल कांग्रेस के करीबी माने जाने वाले आईपीएस अधिकारी राजीव कुमार पर तलवार लटक रही है। पर मुकुल रॉय अचानक पाक साफ हो गए हैं। वे जब तक तृणमूल कांग्रेस में थे, तब तक आरोपों के घेरे में थे। अब वे आरोपियों में नहीं हैं, बल्कि गवाहों में उनका नाम आ गया है।

इसी तरह हिमंता बिस्वा सरमा चिटफंड मामले में आरोपों के घेरे में थे, लेकिन जब वे भाजपा में चले गए तो किसी आरोपपत्र में उनका नाम नहीं आया है। ऐसी सूची लंबी हो सकती है, जो पहले आरोपों के घेरे में थे और अब नहीं हैं या पहले आरोपी नहीं थे और अब केंद्रीय एजेंसियां उनकी तलाश कर रही है। सवाल है कि जब ऐसे संवेदनशील मामलों में जांच इस तरह की राजनीतिक जरूरतों से प्रभावित होंगी तो वैसी जांच का अंत नतीजा क्या निकलना है?

पश्चिम बंगाल में चिटफंड घोटालों की जांच के लिए एक एसआईटी बनी थी, जिसका नेतृत्व 1989 बैच के आईपीएस अधिकारी राजीव कुमार कर रहे थे। अब राजीव कुमार कोलकाता के कमिश्नर हैं। सीबीआई ने जब मामले की जांच संभाली तो उसने एसआईटी की जांच के सारे डिटेल मांगे। अब सीबीआई का कहना है कि इसके कई दस्तावेज गायब हैं। सो, सवाल है कि क्या राजीव कुमार ने किसी को फायदा पहुंचाने के लिए या किसी को बचाने के लिए दस्तावेज गायब किए या सीबीआई किसी को उलझाना चाहती है, जिसके लिए उसे कुछ अतिरिक्त दस्तावेजों की जरूरत है?

ध्यान रहे चिटफंड जांच के तार सीबीआई के पूर्व निदेशक आलोक वर्मा और तब के विशेष निदेशक राकेश अस्थाना से भी जुड़ते हैं। विशेष निदेशक के तौर पर अस्थाना इस मामले को देख रहे थे और उनका आरोप है कि आलोक वर्मा ने इस मामले की जांच में रोड़े अटकाए। तभी यह मामला बहुत सीधा, सरल नहीं है, बल्कि बहुत उलझा हुआ है। इस मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच से ही सचाई सामने आ सकती है, वरना यह मामला बरसों तक राजनीतिक रस्साकशी का खेल बना रहेगा।
केंद्र सरकार के रुख और सीबीआई की सक्रियता से ऐसा लग रहा है कि कोलकाता में निशाना राजीव कुमार या कोई दूसरा अधिकारी नहीं, बल्कि ममता बनर्जी हैं। पिछले हफ्ते अपनी दुर्गापुर की रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सीधे ममता पर आरोप लगाया और कहा कि उनकी पेंटिंग्स चिटफंड के घोटालेबाजों ने खरीदी है। यह भाजपा का पुराना आरोप है। सुदिप्तो सेन और कुछ दूसरे चिटफंट कंपनी के मालिकों के यहां से ममता बनर्जी की पेंटिंग्स बरामद हुई हैं।
सो, अगर जांच आगे बढ़ती है तो उनको पूछताछ के लिए बुलाया जा सकता है। उनके करीबी रहे मुकुल रॉय इस मामले में सीबीआई और भाजपा को कुछ सूचनाएं दे रहे हो सकते हैं। तभी ममता बनर्जी ने राजीव कुमार से पूछताछ के बहाने इस मामले को तूल दिया है। वे ऐसा माहौल बना देना चाहती हैं कि ताकि चिटफंड की आंच उन तक पहुंचे तो पूरे देश में यह मैसेज जाए कि केंद्र सरकार राजनीतिक कारणों से उनको परेशान कर रही है। यह भी इस बात का संकेत है कि चिटफंड की जांच आगे नहीं बढ़ रही है, बल्कि राजनीतिक लड़ाई बन गई है।

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