साक्षात्कार

चुनावी विमर्श से गायब होती नदियां

इस समय पूरे देश में चुनाव और राजनीति की ही चर्चा है। लेकिन दुख की बात है कि लोगों के दीर्घकालिक हितों से जुड़े कई जरूरी मसले अब भी हमारे चुनावी विमर्श से बाहर हैं। नदियों की दुर्दशा ऐसा ही एक मुद्दा है। हालांकि आम जनता भी तात्कालिक लाभ की पूर्ति हो जाने या उसकी उम्मीद बंध जाने पर दीर्घकालिक समाधान की बात भूल जाती है।
सन 1952 में, जब देश का पहला लोकसभा चुनाव (साथ-साथ विधानसभा चुनाव) हुआ था, तब पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में जबर्दस्त सूखा पड़ा था। मद्रास और बंबई जैसे प्रांत भी खासा प्रभावित हुए थे। दो साल बारिश जरूरत के मुताबिक नहीं हुई थी, जिसका मतलब था कि दो साल की अल्पवृष्टि के बाद देश पहली बार वोट डाल रहा था। कांग्रेस पार्टी का घोषणापत्र 14 जुलाई, 1951 की बेंगलोर बैठक में स्वीकार किया जा चुका था, जिसमें यह तय पाया गया कि बहुत से तात्कालिक सामाजिक उद्देश्यों पर काम किया जाना चाहिए। देश के हर आदमी के लिए भोजन की व्यवस्था होनी चाहिए और सबको सिर ढकने के लिए घर मिलना चाहिए। मगर उस समय भारत में विभिन्न देशों से हवाई जहाज द्वारा अनाज मंगवाए जा रहे थे और रेलगाड़ियों के माध्यम से उसे देश भर में भेजा जा रहा था। राहत सामग्रियां यथासंभव सूखा प्रभावित क्षेत्रों में पहुंच रही थीं, फिर भी भूख और भुखमरी की खबरें सुर्खियों में थीं।
जनता की चिंता यह भी थी कि अक्तूबर के पहले पखवाडे़ में यदि बारिश नहीं हुई, तो जबर्दस्त सूखा पड़ेगा और भुखमरी अधिक मुंह बाए सामने खड़ी हो जाएगी। उनकी खरीफ की फसल बर्बाद हो चुकी थी और संकट रबी की फसलों पर था। साधारण मौसम में यदि ‘हथिया’ में तीन इंच बारिश भी हो जाए, तो काम चल जाता है, लेकिन उस वक्त धरती की तपिश को शांत करने के लिए छह इंच पानी का बरसना जरूरी था। जाहिर है, खरीफ और रबी, दोनों फसलों के नष्ट होने का नतीजा भयंकर होता। मगर, अक्तूबर 1951 में हथिया की कमजोर वर्षा के साथ चुनावों की घोषणा क्या हुई, सूखा, पेयजल, रोजगार, पशु चारा जैसे तमाम मसले गौण हो गए और मतदान लोगों के सिर पर चढ़कर बोलने लगा। यह स्थिति लोकसभा और विधानसभा चुनावों के नतीजे आने और मार्च महीने के अंत में मंत्रिमंडल के गठन होने तक बनी रही। इसके बाद ही सूखे के समाचार अखबारों में लौट सके और नेताओं की तरफ से बयान आने लगे। पहले चुनाव से मुद्दों को भरमाने का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह आज तक जारी है, जबकि इस दौरान कई पार्टियां देश पर शासन कर चुकी हैं।
जरूरी मुद्दे किस तरह चुनावी-विमर्श से बाहर हो जाते हैं, इसका एक अन्य उदाहरण बिहार का है। यहां 1999 में गंगा के कटाव से तंग आकर बक्सर और भोजपुर जिलों के मतदाताओं ने चुनाव-बहिष्कार की घोषणा की और जहां-जहां किसी बड़ी पार्टी के नेताओं का प्रचार-कार्यक्रम होता, वहां-वहां कटाव पीड़ित अपनी समानांतर सभाएं करते। चुनाव सभाओं में इन पीड़ितों को आश्वासन तो खूब मिले, लेकिन वे सभी कोरे साबित हुए। दियारा क्षेत्र में बसे लोग आज भी उतने ही परेशान हैं, जितना उन दिनों थे। गांवों का कटना उनकी नियति बन गई है और महीनों सड़क पर बसना मजबूरी। यह समस्या केवल बक्सर या भोजपुर की नहीं, बल्कि गंगा किनारे बसे तमाम लोगों की है। दिक्कत यह है कि इस समस्या के प्रति न कभी संगठित आवाज उठती है और न नेताओं को अपना दायित्व-बोध याद आता है।
चुनाव ही हमें यह मौका देता है कि हम चुने हुए प्रतिनिधियों से सवाल पूछ सकें और उन्हें उनका दायित्व-बोध याद दिला सकें। समस्या का दीर्घकालिक समाधान न करके उसका तात्कालिक हल निकालना लोगों को भ्रम में डाल देता है। मसलन, करीब दस साल पहले कोसी नदी का तटबंध टूटा था, जिसकी जद में 35 लाख की आबादी आ गई। उस समय 4.15 लाख हेक्टेयर जमीन पर पानी फैल गया था। लाखों की संख्या में घर ढह थे और 600 के करीब लोगों की जल-समाधि हुई थी। यह महज संयोग है कि 2005 में आपदा प्रबंधन अधिनियम स्वीकृत हुआ था और उसके साथ राहत पैकेज की घोषणा भी की गई थी, जो उस दौर के हिसाब से काफी आकर्षक था। नुकसान के एवज में लोगों को आकर्षक पैकेज मिले और सभी लोग व्यवस्था के मुरीद बन गए। उन्हें लगा कि यह पहला मौका है, जब उनकी मुसीबत में सरकार उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी है। समय के साथ वे यह भूल चुके थे कि उनकी मुसीबत की वजह संस्था का वही नकारा तंत्र है, जो अपने दायित्व-बोध को भुलाकर अपने नए संस्करण में राहत बांटने का काम कर रहा है। इसका परिणाम यह हुआ कि जहां-जहां कोसी का पानी फैला, वहां-वहां लोकसभा के चुनाव में शासक दल की भारी जीत हुई।
आज इन्हीं सबसे बचने की जरूरत है। अब तो वर्षा भी कम हो रही है और नदियों का पानी भी सूख रहा है। जाहिर है, सदानीरा नदियों के पुनरोद्धार और उनमें हो रहे प्रदूषण को रोकने की जरूरत है। हुकूमत को इस दिशा में काम करना चाहिए। मगर ऐसा नहीं हो रहा। गंगा-दशहरा या कार्तिक पूर्णिमा जैसे त्योहारों में लोग बिना बुलाए घरों से निकल पड़ते हैं। जरूरत इस जन-शक्ति को नई दिशा देने की है। हमारी नदियां तभी अपने पुराने गौरव और पवित्रता को हासिल कर सकेंगी। मगर दिक्कत यह है कि तात्कालिक हल निकालकर उन उपायों की धार कुंद कर दी जाती है, जो किसी समस्या के स्थाई समाधान की जरूरत हैं।

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