राजनीति

जस्टिस जोसेफ की बातों का अर्थ

जस्टिस कुरियन जोसेफ सुप्रीम कोर्ट से रिटायर होने के बाद खुल कर बोले। वे जज रहते भी सर्वोच्च अदालत में हुई छोटी मोटी आजादी की लड़ाई का हिस्सा बने थे। उन्होंने उस समय के चीफ जस्टिस दीपक दीपक मिश्रा के खिलाफ चार सबसे वरिष्ठ जजों की प्रेस कांफ्रेंस में हिस्सा लिया था और खुल कर कहा था कि सर्वोच्च अदालत में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है।
चारों जजों ने कहा था कि मनमाने तरीके से मुकदमों का आवंटन किया जा रहा है और चुनिंदा जजों को केसेज दिए जा रहे हैं। रिटायर होने के बाद जस्टिस कुरियन ने इस बारे में और विस्तार से बात की। उन्होंने कई हैरान करने वाली बात कही। जस्टिस कुरियन ने जो कुछ कहा उसमें से दो बातें बहुत चिंताजनक हैं और उनसे आगे का खतरा दिख रहा है। उन्होंने जस्टिस दीपक मिश्रा का नाम लिए बगैर कहा कि उस समय लग रहा था कि चीफ जस्टिस रिमोट से कंट्रोल हो रहे थे।
दूसरी बात उन्होंने कही कि खास राजनीतिक पूर्वाग्रह वाले जजों को ही कुछ खास मामले आवंटित किए जाते थे। ये दोनों बातें सुप्रीम कोर्ट की स्वतंत्रता और निष्पक्षता, जिस पर उसकी बुनियाद टिकी है, उस पर सवाल उठाते हैं। इससे यह पता चलता है कि देश की सर्वोच्च अदालत रिमोट से कंट्रोल हो सकती है और इसके जज राजनीतिक पूर्वाग्रह से फैसले कर सकते हैं। अगर ऐसा है तो देश की सर्वोच्च न्यायपालिका पर आम आदमी का भरोसा बनाए रखना मुश्किल होगा।
आमतौर पर राजनीतिक मास्टर के हाथों विधायिका के रिमोट से कंट्रोल होने की बात कही जाती है। यूपीए की सरकार के समय कहा जाता था कि मनमोहन सिंह की सरकार रिमोट से दस, जनपथ से चलती है। भाजपा की सरकार के लिए कहा जाता है कि नागपुर के आरएसएस मुख्यालय से उसे कंट्रोल किया जाता है। कार्यपालिका के बारे में भी कहा जाता है कि वह स्वतंत्र रूप से काम नहीं करती है और नौकरशाह राजनीतिक आकाओं के हिसाब से काम करते हैं। पर न्यायपालिका और मीडिया के लिए आमतौर पर माना जाता है कि ये स्वतंत्र व निष्पक्ष रूप से काम करते हैं।
अगर सर्वोच्च अदालत का एक जज कहता है कि सर्वोच्च न्यायपालिका रिमोट कंट्रोल से संचालित होती थी तो यह बहुत बड़े खतरे का संकेत है। इसके दो पहलू हैं। पहला तो यह कथित तौर पर रिमोट कंट्रोल से चलने वाली न्यायपालिका के समय जो फैसले हुए उनको कैसे विश्वसनीय माना जाए? क्यों न यह माना जाए कि उन फैसलों में खोट है?

दूसरा पहलू यह है कि अगर एक बार यह प्रवृत्ति घर कर गई तो खत्म कैसे होगी? जिसने एक समय में न्यायपालिका को चलाया वह दूसरे समय में क्यों नहीं चलाना चाहेगा या एक जज रिमोट से कंट्रोल हो सकता है तो दूसरा क्यों नहीं हो सकता? तभी इस बयान से न्यायपालिका की साख पर बड़ा संकट दिख रहा है, जिसको ठीक करने की सख्त जरूरत है।

इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि हर व्यक्ति का एक राजनीतिक रूझान होता है। लेकिन जब वह अपना काम कर रहा होता है तो उससे उम्मीद की जाती है कि वह हर किस्म के पूर्वाग्रह से ऊपर उठ कर फैसला करेगा। मुंशी प्रेमचंद की कहानी पंच परमेश्वर इसकी सटीक मिसाल है। कहानी के दो पात्र जुम्मन शेख और अलगू चौधरी का एक दूसरे से झगड़ा हो जाता है पर जब दोनों एक दूसरे के खिलाफ मुकदमे में पंच की कुर्सी पर बैठते हैं तो वे स्वतंत्र व निष्पक्ष फैसला सुनाते हैं।
न्यायपालिका का बुनियादी तत्व ही यहीं है। तभी लोग उस पर भरोसा करते हैं। लेकिन जैसा कि जस्टिस कुरियन ने कहा कि खास राजनीतिक पूर्वाग्रह वाले जजों को खास तरह के मुकदमे सौंपे जाते थे। उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया, इसलिए कोई नाम लेना ठीक नहीं है पर हो सकता है कि जिनकी ओर उनका इशारा था वे अब भी सुप्रीम कोर्ट में हों और आगे किसी बड़ी पोजिशन में पहुंच जाएं। फिर क्या होगा? फिर क्या उनके राजनीतिक पूर्वाग्रह के हिसाब से न्यायपालिका काम करेगी? ऐसा न हो यह सुनिश्चित करना सबकी जिम्मेदारी है।
उच्च न्यायपालिका में पिछले कुछ समय से चीजें ठीक हो रही हैं। सरकार के साथ टकराव कम हो गया है और कॉलेजियम की ओर से की जाने वाली सिफारिशें मानीं जाने लगी हैं। सो, ऊपर से देखने पर ऐसा लग रहा है कि सब कुछ ठीक हो रहा है। यह भी लग रहा है कि अगर कोई खतरा है तो वह बाहरी है क्योंकि कई पार्टियां और सामाजिक संगठन खुलेआम अदालत के फैसलों का उल्लंघन कर रहे हैं। पर जस्टिस कुरियन जोसेफ ने कुछ अंदरूनी खतरों की ओर इशारा किया है। उसे समझना होगा।
पूरी न्यायिक बिरादरी को, जिसमें बार और बेंच दोनों शामिल हैं, उनको मिल कर इन खतरों से निपटना होगा। यह सुनिश्चित करना होगा कि राजनीतिक दखलंदाजी न बढ़े, कोई रिमोट से न्यायपालिका को कंट्रोल न कर सके, जजों के राजनीतिक रूझानों का असर उनके फैसलों पर न पड़े। इसके साथ ही कुछ और कमियां हैं, जिनकी ओर दूसरे लोगों ने इशारा किया है। न्यायपालिका में बढ़ते भाई भतीजावाद और फैसलों की क्वालिटी को लेकर सवाल उठे हैं। इसे भी ठीक करने की जरूरत है।

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