राजनीति

जीतने वाले सब पालें, बस मुगालता न पालें

छः माह के भीतर मतदाता माई- बाप ने सबकुछ समझा बुझा दिया है। दिसंबर 2018 में 15 बरस की भाजपा सरकार को सत्ता से ऐसे बाहर किया कि वह न तो जीती है और न ही हारी है। ऐसी स्तिथि जीने-मरने से भी बदतर है। सपने में भी सत्ता सुंदरी आती है। बहुत पीड़ादायक है। व्यक्त करना कठिन है। जिनपर बीत रही है वही जान सकते हैं इस सत्ता विछोह की व्यथा को।इस पराजय के पीछे भी लीडरों के पाले हुए मुग़ालते थे। मतदाता लोकतंत्र का भगवान है।

एक बार के मतदान से लगे हाथ कइयों के मुग़ालते दूर कर देता है। विधानसभा चुनाव में भाजपा नेताओं के और छः महीने बाद ही सत्ता रूढ़ हुई कांग्रेस के भी।वोटर के करिश्मे को जब कांग्रेस नेताओं ने काबिलियत मान हवा में उड़ने की कोशिश की तो लोक सभा चुनाव के अखाड़े में न केवल चित्त किया बल्कि उसकी पीठ लगवा ची,चु,पी,पु….सब बुलवा दिया। विधानसभा से लोकसभा चुनाव तक हार -जीत का कार्यकाल महज छः माह का था। मगर इस अवधि ने जो सबक सिखाया वह सदियों तक याद रहेगा।

मुख्यमंत्री कमलनाथ,मंत्रियों, विधायकों से लेकर इवेंट मैनेजरों (इसमें मीडिया मैनेजर भी शरीक हैं) को ज़मीन पर रहकर जनता के लिए काम करना होगा।यह बिन मांगी सलाह है। इस सलाह पर बिचोलिये काम नही करने देंगे बल्कि कान भरेंगे। नुकसान कांग्रेस का होगा और उससे ज़्यादा प्रदेश का। ऐसे में प्रदेश कांग्रेस कमेटी और उसके पदाधिकारी बेचारी उस माँ, मौसी, बुआ, ताई, काकी, भाभी और बहन की तरह है जिनसे मौका पड़ने पर काम तो कराते हैं मगर उनकी सुनते अपनी सुविधा के हिसाब से हैं।

हमने पहले भी लिखा था कि 2 लाख तक किसान कर्ज माफी के वादे पर किसानों को संदेह था लेकिन लगा कि 15 साल बाद कांग्रेस सरकार में आई तो 2 लाख तक की कर्ज माफी करेगी। लेकिन ऐसा हुआ नही।यह धारणा किसानों में बनी और उन्होंने लगे हाथ हिसाब भी चुकता कर दिया। प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है और उसके पास पाप दूर करने के लिये वादे पूरे कर गंगा नहाने का वक्त है। कर्ज माफी के साथ स्कूल में शिक्षकों की भर्ती,अस्पतालों में डॉक्टर्स की तैनाती, थानों में पुलिसकर्मी की पर्याप्त पदस्थापना, नर्मदा जी समेत नदियों से अवैध रेत खनन रोक और बड़े पैमाने पर पेड़ पौधे लगा कर अपनी काबिलियत साबित कर सकते हैं।

तबादले और पदस्थापना के अलावा भी सरकार के बहुत काम हैं। अभी तो गर्मी के मौसम में ट्रांसफर की बरसात ही रही है। कमलनाथ देश के उन इक्का-दुक्का खुशकिस्मत नेताओं में हैं जिन्हें महज छः माह मरीन वो सब मिल गया जो बड़े बड़ों को हासिल करने में पूरी ज़िंदगी भी कम पड़ती है। मुख्यमंत्री के लिए यह अवसर है इस बात को साबित करने का कि वे मुकद्दर के सिकंदर तो हैं ही काम करने में भी बादशाह हैं।वे भले ही फकीर नही हैं लेकिन प्रदेश की तकदीर बदलने वाले ज़रूर हैं।

सब जानते हैं ज़माना तत्काल असर देखने का है इसलिए आयुर्वेद नही अंग्रेज़ी दवाएं चलन में हैं। नई पीढ़ी और युवा वोटर की तासीर समझनी होगी। वादों पर अमल नही तो निपटारा करने में उसे न तो लीडर से मोहब्बत न पार्टियों की रीति-नीति से लगाव। सब जल्दी में हैं। फेसबुक पे दोस्ती और शादियों का चलन शुरू ही गया है। अब कुंडली मिलाने और घर परिवार देखने का वक्त नही बचा है। यह बात सियासत के धुरंधरों को जितनी जल्दी समझमें आ जाये उनके व देश के हितकर है। दूसरी तरफ भाजपा है।

लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की सुनामी में कई ऐसे नेता महाबली बनकर उभरे हैं जिन्हें उनके परिजन भी वोट नही देते। शेर मारना तो दूर मच्छर भी नही मार पाते। जीते हुए माननीयों की शान में गुस्ताखी माफ के साथ ऐसे कई हैं जिन्हें वार्डों में जीत न मिले लेकिन वे लाखों की रिकॉर्ड जीत दर्ज करा गए। ज़ाहिर है ऐसी जीत को पचा पाना आसान भले ही न हो कठिन ज़रूर है।जीत-हार में शामिल हर नेता अपनी हैसियत जानता है।

इसलिए लाखों वोट से जीतने वालें यह मुग़ालता न पालें की वे बहुत लोकप्रिय जननायक हैं। इसमें हार- जीत का अंतर और मोदी की सुनामी,उनके मुग़ालते दूर करने के लिए पर्याप्त होगी। हमारी तरफ से जीतने वालों की जय-जय… बधाई, शुभकामनाये… बस दरख्वास्त इतनी कि वे कोई मुग़ालता न पालें…

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