राजनीति

टिकट को लेकर दोनों दलों में बढ़ी चिक-चिक

लोकसभा चुनाव के लिए तारीखों का ऐलान भले ही हो गया हो लेकिन लोकसभा चुनाव लड़ने के इच्छुक दावेदारों का टिकट के प्रति संशय बढ़ता जा रहा है। कोई भी दावे से नहीं कह पा रहा है कि उसका टिकट पक्का है, क्योंकि पार्टी के दिग्गज नेता भी सीट बदल सकते हैं या बदली जा सकती है। वहीं पार्टी के बुजुर्ग नेता भी चुनाव में ताल ठोकने के लिए तैयार हैं जबकि हर सीट पर युवा दावेदारों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है। दरअसल लोकसभा का चुनाव पार्टी के माहौल पर बहुत कुछ निर्भर करता है। चुनाव लड़ने का इरादा रखने वाला हर नेता पार्टी का टिकट चाहता है। हर सीट पर दावेदारों की संख्या इतनी बढ़ गई है कि दलों को समझ में नहीं आ रहा कि आखिर किसे टिकट दें।
सर्वे रिपोर्ट ज्यादातर बहुत बड़ा जीत-हार का अंतर नहीं दिखा रही है। राष्ट्रीय स्तर पर भी राजनीतिक माहौल उतार-चढ़ाव ले रहा है। यही कारण है कि तारीख आ जाने के बाद भी राजनीतिक दल अपने पत्ते नहीं खोल रहे हैं बल्कि एक-दूसरे के प्रत्याशियों का इंतजार कर रहे हैं। लगभग देशभर में कड़े मुकाबले के आसार बनने के कारण बेहतर प्रत्याशी की तलाश हर दिन हो रही है। बहरहाल मध्यप्रदेश में भाजपा के इस समय 26 सांसद हैं, लेकिन पार्टी ने अभी तक किसी का भी टिकट तय नहीं किया है। यहां तक की लगातार इंदौर लोकसभा से चुनाव जीत रहीं लोकसभा के अध्यक्ष सुमित्रा महाजन के टिकट पर भी संशय है।
केंद्रीय मंत्री नरेंद्र तोमर, थावरचंद गहलोत कहां से चुनाव लड़ेंगे, कहा नहीं जा सकता। इसी तरह भाजपा के अन्य सांसदों की भी स्थिति है। मध्यप्रदेश में 15 वर्षों के बाद सत्ता जाने के बाद भाजपा खासी सतर्क हो गई है और संघ भी सावधान हो गया है। संघ प्रमुख मोहन भागवत प्रदेश के महानगरों में इस समय दौरे कर रहे हैं और जमीनी हकीकत समझ रहे हैं और भाजपा नेताओं को समझा भी रहे हैं। संघ अधिकांश सांसदों के टिकट काटने या क्षेत्र बदलने के पक्ष में है। प्रदेश में कांग्रेस जिस तरह से लगभग बीस लोकसभा सीटें जीतने की योजना पर काम कर रही है उससे भी भाजपा की मुश्किलें बढ़ती दिखाई दे रही हैं।
इस समय प्रदेश में कांग्रेस की केवल 3 सीट है और विधानसभा चुनाव के दौरान उसने 12 लोकसभा सीटों पर बढ़त बनाई थी। कांग्रेस के रणनीतिकारों का मानना है कि यदि पार्टी ने प्रयास किए तो वह 20 सीटें जीत सकती है अन्यथा 2009 की तरह 9 सीटें तो वह जीत ही सकती है। इसके लिए पार्टी ने दिल्ली में बैठकें शुरू कर दी हैं लेकिन अभी तक उसने प्रत्याशियों की घोषणा नहीं की है क्योंकि वह भी भाजपा के प्रत्याशियों की सूची देखना चाहती है। भाजपा में जिस तरह से बाबूलाल गौर, राघवजी और रघुनंदन शर्मा चुनाव लड़ने की इच्छा जता रहे हैं उससे पार्टी को नए सिरे से रणनीति बनाने पर मजबूर होना पड़ा है जबकि कांग्रेस विधानसभा चुनाव की तरह ही भाजपा के कुछ नेताओं को पार्टी में शामिल करके चुनाव लड़ाना चाहती है।

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