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तुनकमिजाजी ममता का भाजपा विरोधी महागठबंधन कितना रहेगा सफल? – Rashtriya Pyara
साक्षात्कार

तुनकमिजाजी ममता का भाजपा विरोधी महागठबंधन कितना रहेगा सफल?

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भाजपा के राज्य में बढ़ते प्रभाव से घबराई ममता यह कहने पर मजबूर हो गई हैं कि भाजपा को हराना है तो कांग्रेस और लेफ्ट को साथ आना होगा। ममता के डर को समझने के लिए लोकसभा चुनाव 2014 के नतीजे पर गौर करना जरूरी है।
साल था 2016 का तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल, पुडुचेरी और असम में विधानसभा चुनाव की तैयारी अपने चरम पर थी। लोकसभा चुनाव 2014 में 17 फीसदी वोट पाकर गदगद भाजपा कार्यकर्ता मई के महीने में बंगाल में भाजपा के उदय का सपना संजोये थे। लेकिन कोलकाता की एक जनसभा में पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की घोषणा ने सभी को उस वक्त हैरत में डाल दिया था। शाह ने घोषणा कर दी कि पार्टी की प्रदेश इकाई 2019 की लड़ाई की तैयारी करे। लोगों को लगा कि भाजपा ने अपने हथियार डाल दिए। विधानसभा चुनाव में हुआ भी कुछ ऐसा ही ममता दीदी के दीवाने वोटरों ने बंगाल की 294 सीटों में से 211 सीटें तृणमूल के खाते में डाल दी। लोकसभा चुनाव में 17 फीसद वोट हासिल करने वाली भाजपा विधानसभा चुनाव में 10 फीसद वोट के साथ 3 विधानसभा सीटें प्राप्त कर सकी। लेकिन अमित शाह ‘काक चेष्टा,बको ध्यानम’ की तर्ज पर भविष्य की बड़ी लड़ाई जीतने पर केंद्रित थे। शाह की दूरदृष्टि पश्चिम बंगाल में ममता के अखंड राज में सेंध लगाने के रास्ते को तलाश रही थी।
लोकसभा चुनाव 2019 के शंखनाद से पहले जनवरी की सर्द दोपहरी को कोलकाता के बिग्रेड मैदान में ममता बनर्जी जब विपक्षी एकता की हुंकार भर रही थीं। तब उनकी नजर दिल्ली की कुर्सी पर गड़ी थी। एक मंच पर 22 पार्टियों को तब ममता ने जुटा तो लिया था। लेकिन जब चुनाव की बारी आई तो एकला चलो रे की तर्ज पर अकेले ही चुनाव में जाने का फैसला किया। मोदी सरकार से सीधे लोहा लेती ममता हरेक रैलियों में भाजपा के 100-150 सीटों पर सिमट जाने की भविष्यवाणी भी करती दिखीं थीं। लेकिन लोकसभा चुनाव में जनता की ममता मोदी सरकार पर जमकर बरसी और बंगाल ने तो 2 सीटों से 18 सीटों पर पहुंचा दिया। जिसकी तैयारी करने की बात साल 2016 में ही अमित शाह ने राज्य के पार्टी कार्यकर्ताओं से कही थी। नतीजतन कभी लाल किले का ख्वाब देखने वाली ममता अब कोलकाता का किला बचाने के लिए हाथ-पैर मार रही हैं।
भाजपा के राज्य में बढ़ते प्रभाव से घबराई ममता यह कहने पर मजबूर हो गई हैं कि भाजपा को हराना है तो कांग्रेस और लेफ्ट को साथ आना होगा। ममता के डर को समझने के लिए लोकसभा चुनाव 2014 के नतीजे पर गौर करना जरूरी है। लोकसभा चुनाव 2014 में 34 सीटें जीतने वाली तृणमूल कांग्रेस की सीटें 2019 में घटकर 22 हो गईं। 2014 में 2 सीटें जीतने वाली माकपा का इस बार खाता भी नहीं खुला। जिस कांग्रेस ने 2014 में चार सीटें जीती थीं वो 2 सीटों पर ही सिमट गई। वहीं 2014 में 2 सीटों के साथ चौथे नंबर की पार्टी रही भाजपा 18 सीटों का सफर तय करते हुए तृणमूल के बाद राज्य की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई। भाजपा बंगाल में न सिर्फ सीट बल्कि वोट शेयर के मामले में भी तृणमूल के करीब पहुंच गई है। लोकसभा चुनाव 2014 में तृणमूल को 35 फीसदी, माकपा को 30 फीसदी, कांग्रेस को 10 फीसदी और भाजपा को 17 फीसदी वोट प्राप्त हुए थे।
वहीं 2017 के बंगाल विधानसभा चुनाव की बात करें तो 45 फीसदी वोट शेयर के साथ राज्य की 211 सीटें तृणमूल ने अपने नाम की थी। 20 फीसद वोट लाकर माकपा 26 सीट जीत पाई थी। कांग्रेस 12 फीसदी वोट के साथ 44 सीटें जीतने में कामयाब हुई थी। भाजपा का वोट शेयर इस चुनाव में 10 फीसद रहा और सीटों की संख्या महज 3 थी। लेकिन साल 2019 के लोकसभा चुनाव में तृणमूल का वोट प्रतिशत 43 रहा और सीटें मिलीं 22, भाजपा ने 40 फीसदी वोट शेयर के साथ 18 सीटें अपने नाम कीं, 6 फीसदी वोट लाने वाली माकपा का तो खाता भी नहीं खुला। वहीं कांग्रेस को 6 फीसद वोट के साथ 2 सीटें हासिल हुईं। इन आंकड़ों ने जब ममता को आईना दिखाया तो उन्हें लेफ्ट और कांग्रेस की याद आई। 2021 में विधानसभा चुनाव होने हैं। पीएम मोदी और अमित शाह के एजेंडे में बंगाल सबसे ऊपर है। इसलिए ममता अभी से महागठबंघन का राग अलाप रही हैं।

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