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नई शिक्षा नीति और चुनौतियां! – Rashtriya Pyara
राजनीति

नई शिक्षा नीति और चुनौतियां!

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केंद्र सरकार ने लंबे समय तक विचार विमर्श करने और शोध, बदलाव के बाद नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मसौदा जारी कर दिया है। मसौदा जारी होने के बाद से इस पर विवाद ज्यादा हुआ है और वस्तुनिष्ठ चर्चा कम हुई है। सबसे पहले लोगों ने इसमें शामिल किए गए त्रिभाषा फार्मूले को पकड़ लिया और उसका विरोध शुरू हो गया। इसका नतीजा यह हुआ कि इस मसौदा शिक्षा नीति की कई बातें बिल्कुल ओझल हो गईं। जबकि इस मसौदा शिक्षा नीति में कई बहुत अच्छी बातें शामिल की गई हैं, जिन पर अमल हो जाए तो शिक्षा के क्षेत्र में बड़ी क्रांति हो सकती है।

केंद्र की पिछली नरेंद्र मोदी सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति बनाने का फैसला किया था। उसके बाद दो सरकारों और तीसरे शिक्षा मंत्री के कार्यकाल में मसौदा नीति जारी की गई है। के कस्तूरीरंगन कमेटी ने अपनी सिफारिशें सरकार को सौंपी, जिसे आम लोगों की राय के लिए जारी किया गया। आम लोगों के सुझावों के आधार पर इसमें कुछ बदलाव होंगे। जैसे त्रिभाषा फार्मूले के विरोध की वजह से सरकार ने इसमें बदलाव कर दिया है और हिंदी अनिवार्य करने के प्रावधान को हटाने का फैसला किया है। ऐसे ही हो सकता है कि कुछ नई चीजें जोड़ी जाएं और कुछ चीजें हटा दी जाएं। फिर भी यह कहा जा सकता है कि ये एक क्रांतिकारी दस्तावेज है, जिसके प्रावधानों को जहां तक संभव हो, लागू करना चाहिए।

इस मसौदा शिक्षा नीति की एक खास बात यह है कि इसमें तीन से 18 साल की उम्र तक के बच्चों और किशोरों को शिक्षा के अधिकार के दायरे में लाने का प्रावधान किया गया है। इससे पहले छह से 14 साल के बच्चों को इस श्रेणी में रखा जाता था। जिस समय छह से 14 साल के बच्चों की श्रेणी बनी थी, तब तमाम शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसका विरोध किया था। उनका कहना था कि निजी स्कूलों में बच्चे तीन से चार साल की उम्र में दाखिला ले लेते हैं, जबकि बाकी बच्चों का दाखिला छह साल की उम्र में होता है।

इसलिए जो बच्चे शिक्षा के अधिकार नीति का हिस्सा थे, वे निजी स्कूलों में जाने वाले बच्चों से पिछड़ जाते थे। प्राथमिक शिक्षा में ही जो बच्चे पिछड़ गए वे आगे भी पिछड़े ही रहते थे। वैसे वैज्ञानिक शोधों से यह भी पता है कि बच्चों के मस्तिष्क का 85 फीसदी विकास पांच साल तक की उम्र तक हो जाता है। इसलिए जो बच्चे तीन या चार साल की उम्र में सीखना शुरू करते हैं वे ज्यादा बेहतर करने में सक्षम होते हैं।

सो, यह पहल स्वागत के लायक है कि तीन साल से 18 साल तक बच्चों को शिक्षा के अधिकार के दायरे में लाया जाए। हालांकि इसकी अपनी चुनौतियां हैं। सरकार इसका दायरा बढ़ाती है तो अचानक बच्चों की संख्या बहुत बढ़ जाएगी। इसके लिए सरकार के पास बुनियादी ढांचा नहीं है। न तो स्कूल हैं, न शिक्षक हैं और न दूसरी बुनियादी चीजें हैं। सो, सरकार को पहले उस पर खर्च करना होगा और बुनियादी ढांचा मजबूत करना होगा।

मसौदा शिक्षा नीति ने यह बड़ा महत्वाकांक्षी लक्ष्य शिक्षा पर खर्च बढ़ाने का तय किया है। इसमें कहा गया है कि अगले कुछ वर्षों में शिक्षा पर जीडीपी का छह फीसदी खर्च होगा। अभी जीडीपी का तीन फीसदी शिक्षा पर खर्च किया जा रहा है। शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए खर्च बढ़ाना सबसे पहली जरूरत है। इसका कारण यह है कि भारत में अच्छे शिक्षकों की भारी कमी है और साथ ही बुनियादी ढांचे का भी अभाव है। यह अभाव प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च और उच्चतर शिक्षा और तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में भी है।

भारत में शोध पर बहुत कम खर्च होता है क्योंकि शिक्षकों के वेतन और स्कूल, कॉलेजों को रखरखाव पर ही सारे पैसे खर्च हो जाते हैं। गुणवत्तापूर्ण और शोधपरक शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए उस पर खर्च बढ़ाना होगा। नई मसौदा नीति में जीडीपी का तीन की बजाय छह फीसदी हिस्सा खर्च करने के साथ साथ शिक्षा पर होने वाले सार्वजनिक खर्च को 10 से बढ़ा कर 20 फीसदी करने पर जोर दिया गया है। खर्च बढ़ाने की जरूरत के पीछे यह तर्क दिया गया है कि शिक्षा को शोधपरक बनाना है। वैसे यह बहुत बड़ी चुनौती है पर अगर इस पर अमल हो जाता है तो बहुत बड़ा बदलाव संभव है।

मसौदा शिक्षा नीति में सबको साक्षर बनाने और स्कूलों में दाखिले का प्रतिशत दोगुना करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य भी तय किया गया है। यह भी बहुत बड़ा लक्ष्य है पर इसे हासिल करना संभव हो सकता है अगर सरकार ऊपर बताई गई दो बातों पर कायदे से अमल कर दे। अगर शिक्षा के अधिकार का दायरा बढ़ा दिया जाए और शिक्षा पर होने वाले खर्च को दोगुना कर दिया जाए तो सबको साक्षर बनाना और दाखिले का प्रतिशत बढ़ाना बहुत बड़ी बात नहीं होगी।

इस मसौदा नीति में एक राष्ट्रीय शिक्षा आयोग बनाने की भी बात कही गई है। यह भी एक महत्वाकांक्षी पहल है। इस मसौदा नीति की एक अच्छी बात यह भी है कि इसमें प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च और तकनीकी शिक्षा तक की स्थिति पर बराबर ध्यान दिया गया है और उसमें सुधार के उपाय सुझाए गए हैं।

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