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नारियल : जूही और नरेंद्र की जिंदगी में जहर घोल रही थी नंदा

नरेंद्र के जाते ही जूही सोच में मग्न पलंग पर ढेर हो गई. उसे न आकर्षक ढंग से सजाए 2 कमरों के इस मकान में रखे फूलदार कवर वाले सोफों में आकर्षण महसूस हो रहा था, न जतन से संवारे परदों में. दीवारों पर लगे सुंदर फोटो और एक कोने में सजे खिलौने जैसे मुंह चिढ़ा रहे थे. उसे लग रहा था जैसे कि नंदा की शरीर की महक अभी कमरे की आबोहवा में फैली हुई है और कभी प्रिय लगने वाली यह महक अब उसे पागल बनाए बिना न रहेगी. दिमाग की नसें जैसे फटना चाहती थीं. हवादार कमरे की खिड़कियों से आती सर्दी की हवाएं जैसे जेठ की लू बन कर रह गई थीं. जो कुछ हुआ था, उस की उम्मीद कम से कम जूही के भोले मन को कतई न थी. हुआ यह कि कठोर अनुशासन वाली सास के घर में बाहर की हवा को तरस गईर् जूही में, नरेंद्र की नौकरी लगते ही अपना अधिकारबोध जाग गया कि अब वह इस घर के एकमात्र कमाऊ बेटे की पत्नी है. सास, ससुर, देवर, ननदें सभी उस के पति की कमाई पर गुलछर्रें उड़ाने को तैयार हैं. लेकिन वह उन्हें गुलछर्रे नहीं उड़ाने देगी और उड़ाने भी क्यों दे, आखिर इन लोगों ने उस के साथ कौन सी नेकी कर दी है. ननदें एकएक चीज ठुनकठुनक कर ले लेंगी, देवर गले पड़ कर अपनी जरूरतें पूरी करा लेंगे, पर यह नहीं सोचेंगे कि भाभी भी जीतीजागती इंसान है, उस का भी अपना सुखदुख है, उस की भी बाहर घूमनेफिरने की इच्छा होती होगी.

सारा काम उस ने अपने जिम्मे ले लिया तो सब आजाद हो गए. मरो, खपो, किसी को हाथ बंटाने की जरूरत ही नहीं महसूस होती. लता ने एक बार कह दिया था, ‘हमारी भाभी बहुत काम करती हैं. घर में किसी दूसरे को कोई काम छूने ही नहीं देतीं.’ ‘तो कौन सा एहसान कर रही है किसी पर, मैं ने इसे घर दे दिया, पालपोस कर जवान बेटा दे दिया,’ सास तुनक कर बोली थीं.

जूही के मन में आया था कि वह भी उन्हीं की तरह हाथ नचा कर कह दे, ‘क्यों दिया था जवान बेटा, बैठाए रहतीं उसे अपनी गोद में, आंचल में छिपाए.’ पर कुछ सोच कर वह मन मसोस कर रह गई. ऐसे मौके पर सास की आंखों में उभरे लाललाल डोरे और फिर एक ठंडेपन से मार्मिक बात कह देने से उन के आतंक से पूरा घर खौफ खाता था, तो जूही ही इस का अपवाद कैसे होती? हां, उस ने काम करने की रफ्तार बढ़ा दी थी. औफिस से लौटे नरेंद्र की चाय के बाद उस से भेंट तभी हो पाती जब रात के 10 बजे वह ऊंघने लगता. अपने पांवों पर जूही के शीतल हाथों का स्पर्श पा कर वह चौंक उठता. जाड़े में यह स्पर्श एकाएक अटपटा सा लगता और वह उस के देर से आने पर और घर के काम को उस की तुलना में वरीयता देने पर झुंझलाता.

एक दिन जूही ने नरेंद्र से कहा, ‘घर में कलह न हो, इसलिए इतना काम करती हूं, पर मांजी रातदिन भुनभुनाया करती हैं कि यह तो दिनभर नरेंद्र की कमर से कमर जोड़े रहती है, कामधाम में मन ही नहीं लगता.’ नरेंद्र को मां की यह बात, पत्नी पर अत्याचार लगी. उस ने आश्चर्य से कहा, ‘अच्छा ऐसा कहती हैं?’

जूही ने अपने चेहरे पर जो भाव बना रखे थे, उन में आंखों का छलक आना कुछ कठिन नहीं था. उस ने कहा, ‘कहा तो बहुतकुछ जाता है, लेकिन सारी बातें सुना कर तुम्हारा दिल दुखी कर के क्या फायदा?’ फिर तो नरेंद्र की बढ़ती उत्सुकता जूही से कुछ मनगढ़ंत बातें उगलवा लेने में सफल रही. इन बातों में सर्वप्रमुख यह थी कि मांजी कह रही थीं, ‘अच्छा रहेगा, नरेंद्र के 10 साल तक कोई बालबच्चा ही न हो, नहीं तो उस की तनख्वाह उन्हीं पर खर्च होने लगेगी. तब जूही भी दिनभर घर का काम नहीं कर पाएगी.’

इस बात ने ऐसा रंग दिखाया कि नरेंद्र जूही की हर बात मानने को तत्पर हो गया. जूही ने भी उसे अपनेपन के ऐसे लटकेझटके दिखाए कि नरेंद्र को लगा, जैसे जूही के साथ अलग मकान ले कर रहने और दूसरी जगह तबादला करवा लेने में ही उस का हर तरह से कल्याण है. घर के लोग उसे नोच कर खा जाने वाले भेडि़ए लगे, जिन का उस से लगावमात्र उतना ही है, जितना हिंसक पशु का शिकार से होता है. जो मां पुत्र की कमाई के लिए उस का वंश चलते नहीं देखना चाहती, उसे मां कैसे कहा जाए? ऐसे लोगों का साथ जितनी जल्दी हो सके, छोड़ देना चाहिए.

फिर वे तबादले के बाद इस घर में आ गए. नरेंद्र और जूही 2 ही तो प्राणी थे. जूही में काम करने और व्यवस्था की आदत तो शुरू से ही थी. उस ने घर को फुलवारी की तरह सजा दिया. सीमित साधनों में जैसा रखरखाव और व्यवस्था जूही ने बना रखी थी उस से नरेंद्र के साथियों को सोचना पड़ता था कि घर तो नारी से ही आबाद होता है, किंतु वैसी गुणी नारी होनी चाहिए. वह नरेंद्र का ऐसा खयाल रखती कि उसे लगता, जैसे सच्चे अर्थों में जिंदगी तो अब शुरू की है. नरेंद्र भी हर तरह से जूही का खयाल रखता, उस के जन्मदिन पर बढि़या पार्टी और यादगार उपहार देता. औफिस के बाद यदि समय होता तो जूही के साथ घूमने भी निकल जाता. वास्तव में इसी आजादी के लिए तो जूही ने अपने घर में अपने झूठ से कलह का माहौल बना दिया था.

कुछ दिनों बाद ही महल्ले की महिलाओं के साथ उस का दोस्ताना बढ़ सा गया था. किसी को वह स्वेटर का नया डिजाइन बताती तो किसी की साड़ी की फौल ठीक कर देती. रमाबाबू की विधवा बहन नंदा को उस के पास बैठ कर बात करने में विशेष शांति मिलती थी, क्योंकि और जगहों पर उसे पसंद नहीं किया जाता. जूही नंदा को समझाती, ‘जिंदगी रोने से नहीं कटती है. कुछ काम करो और अपनी जिंदगी की नई शुरुआत करने पर भी गंभीरता से सोचो.’

एक दिन उस ने यह बात नरेंद्र की उपस्थिति में भी कही थी, ‘देखो, अभी क्या उम्र है, मुश्किल से 25 वर्ष की होगी और क्या गत बना रखी है अपनी? कुदरत ने गोरा संगमरमरी बदन, अच्छी कदकाठी और बोलती आंखें क्या इसलिए दी हैं कि इन्हें रोरो कर गला दिया जाए? खबरदार, जो आइंदा चेहरे पर मनहूसी छाई.’ फिर जब उस ने अपनी गुलाबी रंग की एक सुंदर साड़ी उसे पहनाई तो नरेंद्र को भी लगा, जैसे नंदा वाकई सुंदर कही जा सकती है, उस की आंखें वास्तव में आकर्षक हैं.

धीरेधीरे नंदा की रुचि, जूही भाभी के बजाय नरेंद्र में बढ़ती गई और नरेंद्र की नंदा में. कई बार जब दोनों की आंखें बोलती होतीं तो जूही की दृष्टि भी उन पर पड़ जाती. परंतु वह उसे अपने मन का वहम समझ लेती या सोचती कि यदि उस की शंका निर्मूल हुई तो नंदा के दुखी हृदय को ठेस पहुंचेगी और नरेंद्र भी उस के बचपने वाले सवाल से उस की अक्ल के विषय में क्या सोचेगा? पर एक दिन वह सन्न रह गई थी जब उस ने देखा था कि बत्ती चली जाने पर अंधेरे में नरेंद्र ने नंदा को अपनी बांहों के घेरे में ले लिया था और तभी बिजली आ गई थी.

जूही को लगा था जैसे उस

के पैरों के नीचे काला सांप आ गया हो, जिसे उस ने दूध पिलाया, वही सर्पिणी बन कर उस की सुखी गृहस्थी में दंश मार चुकी थी. जिस नरेंद्र को पूर्णरूप से पाने के लिए उस ने संयुक्त परिवार की जड़ों में मट्ठा डाला, वही पराया हो गया. वह जज्ब न कर सकी, ‘तुम लोग इतने नीचे गिर जाओगे, मैं सोच भी नहीं सकती थी.’

फिर उस ने नंदा की ओर देख कर कहा, ‘निकल जा मेरे घर से, और फिर कभी यहां कदम रखने की कोशिश मत करना.’’ नरेंद्र ने बजाय लज्जित होने के त्योरियां चढ़ा लीं और कड़े स्वर में कहा था, ‘घर आए मेहमान से तमीज से बात करना सीखो. रही बात इस के यहां आने की, तो तुम कौन होती हो इसे निकालने वाली? यह घर मेरा है और यहां किसी का आनाजाना मेरी इच्छा से होगा. जिसे यह मंजूर हो, वही यहां रह सकता है, नहीं तो अपना रास्ता देखे.’

जूही समझ गईर् कि रास्ता देखने का संकेत उसी की ओर है. वह सोचने लगी, ‘तो ये इतने आगे निकल चुके हैं. इस घर के स्वप्न को संजोने वाली जूही घर के लिए इतनी महत्त्वहीन हो चुकी है कि एक बेहया औरत के लिए उस की कुरबानी बेधड़क दी जा सकती है?’ फिर तो नरेंद्र के आने के बाद नंदा का उन के घर आना आम बात हो गई. नरेंद्र पर जूही के अनुनयविनय का प्रभाव न होना था, न हुआ. उस ने साफ कह दिया, ‘तुम्हें घर में रहना हो, तो रहो, नहीं तो मैं नंदा के साथ बाकायदा अदालती शादी कर के उसे घर ले आऊंगा और तुम्हें दूसरा रास्ता चुनना होगा.’

इस दूसरे रास्ते के खयाल से ही जूही विकल हो जाती थी. मायके वाले कितने दिन रखेंगे? भाभियों के ताने सुन कर बेशर्मी की रोटियां वह कितने दिन खा सकेगी? भाइयों के अपने परिवार हैं, भाभियों की अपनी इच्छाएं हैं. किसी के लिए कोई क्यों अपनी इच्छाओं का गला घोंटेगा? जूही का मन डूब रहा था. उसे पार लगाने वाला कोई हाथ दिखाई नहीं पड़ता था. इस दुर्दिन में उस का ध्यान अपनी सास पर गया. एकदम कड़े मिजाज की सास के सामने नरेंद्र भी तो भीगी बिल्ली जैसा बना रहता था. यहां आने के समय भी तो वह उन से मुंह खोल कर कुछ कह नहीं पाया था. अगर वे यहां होतीं, तो क्या नरेंद्र की ऐसी हिम्मत पड़ती या नंदा दिन में 10 बार घर के चक्कर लगा पाती? वह अपराधभाव से ग्रस्त हो गई. यह स्थिति तो वास्तव में उस के न्यारे रहने के काल्पनिक सुख के लिए बोले गए झूठ से ही बनी है. अगर वे आ जाएं तो अब भी बात बन सकती है. मगर वे आएं तो कैसे? वह उन से कहे भी तो किस मुंह से?

अगर वह सास को यहां लाना भी चाहे, तो क्या वे मान जाएंगी? उस के हृदय के दूसरे पक्ष ने उसे आश्वस्त किया कि तू ने अपने स्वार्थ के आगे सास की ममता देखी ही कहां? जब एक बार उसे डायरिया हो गया था, तो हालत खराब हो जाने पर सास ही तो पूरी रात उस के सिरहाने बैठ कर जागती रही थीं.

बहुत सोचसमझ कर उस ने सारी स्थिति पत्र में लिख कर अंत में लिख दिया, ‘वैसे तो मैं स्वयं आप को लेने आती, मगर किस मुंह से आऊं? यह जान लीजिए कि मेरे वहां से हटते ही घर में मेरा रहना भी दूभर हो जाएगा. मैं छोटी हूं. मुझ से गलती हो सकती है, लेकिन उसे क्षमा तो बड़े ही करते हैं. यदि आप नहीं आईं तो मैं समझूंगी, मां की ममता अब दुनिया में नहीं रही, क्योंकि मेरी मां तो है नहीं, मैं आप को ही मां समझती हूं.’ 5वें दिन ही हरीश और नवल के साथ मांजी का भारीभरकम स्वर दरवाजे पर सुनाई पड़ा, ‘‘अब दरवाजा खोलोगी भी या नहीं, बस में बैठेबैठे पांव ही टूट गए.’’

उस समय नरेंद्र और नंदा भी घर पर ही थे. मांजी की गंभीर वाणी सुन कर नरेंद्र के चेहरे की हवाइयां उड़ने लगीं. उस ने नंदा को जल्दी से जाने का इशारा कर दिया. पर नंदा जाती तो तब, जब निकलने का दूसरा दरवाजा होता. वह हकबकाई सी खड़ी थी. जूही को तो जैसे मरुस्थल में प्यास से बिलखते व्यक्ति की तरह किसी जलधारा का कलकल स्वर सुनाई दे गया था. उस ने जल्दी से दरवाजा खोला और सास के पैरों पर मत्था रख दिया. वे जोर से बोलीं, ‘‘अरे, अब यह सब नौटंकी बाद में करना. पहले मेरा झोला थाम. मेरे हाथ दुखने लगे हैं,’’ फिर उन्होंने आवाज दी, ‘‘नरेंद्र, नवल के सिर से टोकरी उतार. और हरीश, तू भी अपना मरतबान रख. उजबक की तरह मुंह फाड़े क्या देख रहा है,’’ इस के साथ ही वे आंगन में पड़े पलंग पर बैठ गईं. उन की भीमकाय काया से पलंग चरमरा उठा. उन की तनी आंखों, कड़कदार आवाज और पलंग की चरमराहट ने मिल कर जैसे एक आतंक की सृष्टि कर दी. नंदा को लगा, शेरनी के आने पर तो परिंदे चीख कर भाग जाते हैं, लेकिन इन के सामने तो चीखने की भी हिम्मत नहीं पड़ेगी. उसे लगा, मांजी की दृष्टि उस को तोल रही है, जैसे कोई बच्चा किसी ढेले को फेंकने से पहले उसे तोलता है. उस का यह असमंजस भांप कर नरेंद्र ने नंदा को जाने का हाथ से इशारा किया. नंदा को जैसे जान मिल गई. उस ने एक कदम ही उठाया होगा कि मांजी अपनी बुलंद आवाज में बोलीं, ‘‘ठहरो, अभी कहां जाओगी. जरा इस को भी मेरी लाई मिठाइयां और फल खाने को दो. यह किस की लड़की है? इतनी बड़ी हो गई, अभी इस की शादीवादी नहीं हुई क्या, देखने से तो ऐसा ही लगता है.’’

जूही ने सब के साथ ही नंदा को भी मांजी की लाई मिठाई और फल वगैरह दिए. मगर इतने सवालों के साथ मिठाई और फलों की मिठास जैसे गायब हो गई थी. वह साफ देख रही थी कि नरेंद्र मां के सामने आंख उठा कर उस की ओर देख भी नहीं पा रहा है. वह बिलकुल मेमने जैसा लग रहा है. जिस नरेंद्र ने उस से प्रेम किया था, उस के साथ जीनेमरने की कसमें खाई थीं, वह एक जिंदादिल इंसान था. उस का यह रूप तो रीढ़हीन केंचुए जैसा है. यह रूप ले कर क्या वह समाज से टक्कर ले सकेगा? उसे लगा, कम से कम मांजी के यहां रहते तो नहीं? वह चुपचाप वहां से खिसकना चाहती थी कि मांजी ने कहा, ‘‘अभी इतनी जल्दी भी क्या है जाने की, बैठो.’’

फिर उन्होंने नरेंद्र से कहा, ‘‘बनियाइन, कमीज उतार…’’ कपड़े उतारने पर नरेंद्र पर ऐक्सरे जैसी नजर डाल कर बोलीं, ‘‘इसी सुख के लिए यहां रह रहा है, एकएक पसली गिन लो. बहू, तूने इसे यही खिलायापिलाया है? अब जब तक तू अपने जिले में तबादला नहीं करा लेता, मैं यहीं रहूंगी. अपना घर अपना ही होता है. इस बड़े शहर की फिजा में जहरीले मच्छर घूमते हैं. यहां से लाख दर्जा अच्छा अपना कसबा है, जहां हर चीज सस्ती है.’’

नरेंद्र और नंदा इस प्रवचन के बंद होने के इंतजार में जैसे जमीन में आंखें गड़ाए बैठे थे. मां फिर नरेंद्र से बोलीं, ‘‘देख, ये हरीश और नवल तुझ से कितने छोटे हैं और कैसे खिले पट्ठे हो गए हैं. तेरे बापू की पैंशन और गांव की खेती के सहारे हम ने मकान को दोमंजिला कर दिया है और 2 भैंसें भी पाल रखी हैं.’’ नंदा का मन पूरी तरह से बुझ गया था. वह मांजी और उन के साथ आए हट्टेकट्टे बेटों को देख कर घबरा उठी कि यह औरत उस की कामनाओं की कृषि पर मानो पाला बन कर पड़ गई है. निराशा से लंबी सांस ले कर वहां से चल दी.

बाहर निकल कर वह इस आशा से घूम कर पीछे देखने लगी कि शायद नरेंद्र उसे इशारों में ही कुछ दिलासा दे. मगर उस की आंखें उठ नहीं रही थीं. अगले दोचार दिन नरेंद्र बड़ा व्याकुल रहा. रमाबाबू के घर चाय के बहाने नंदा से थोड़ी देर के लिए मुलाकात हो जाती थी, लेकिन इतने भर से प्यासे हृदयों को तसल्ली कैसे मिलती? रमाबाबू के सामने वे एकदूसरे को अधिक से अधिक देख ही सकते थे. दोनों के शरीर एकदूसरे से मिलने को तड़प रहे थे.

एक दिन रमाबाबू के न होने पर नंदा ने कहा था, ‘‘इसी बूते पर प्यार की कसमें खाते थे, संसार से टकराने की बात करते थे. अब मां के सामने भीगी बिल्ली बन गए.’’ नंदा के उत्तेजित करने से नरेंद्र का अहं जागृत हुआ, ‘‘मैं अब दूधपीता बच्चा नहीं हूं जो हर काम के लिए मां की मरजी का मुंह ताकूं…खुद कमाता हूं, खाता हूं, किसी से मांगने नहीं जाता हूं. अपनी जिंदगी अपनी मरजी से जीऊंगा,’’ उस ने नंदा को दिलासा देते हुए कहा, ‘‘तुम घबराओ मत. मैं मां से साफसाफ बात कर लूंगा. तुम्हारे बिना मैं जी नहीं सकता.’’

नंदा को हालांकि भरोसा नहीं था, फिर भी वह उसे उत्साहित करती हुई बोली, ‘‘तुम हिम्मत से काम लो, सब काम बन जाएगा.’’

‘‘हां, जानेमन, मेरी हिम्मत देखनी हो तो शाम को घर चली आना,’’ नरेंद्र ने नंदा के हाथ पर हाथ मार कर कहा. उस दिन शाम को औफिस से लौटने पर नरेंद्र, नंदा के साथ आया था. लाल साड़ी में नंदा बड़ी फब रही थी और नरेंद्र भी अकड़ाअकड़ा दिखाई दे रहा था. उन दोनोें को देख कर जूही के उन अरमानों पर पानी जैसा पड़ गया था जिन के साथ उस ने गोभी और प्याज की पकौडि़यां चाय के साथ तैयार की थीं, रसोई में जा कर वह आंसू बहाने लगी.

बहू के आंसू देख कर सास ने पूछा, ‘‘यह क्या, फिर टेसुए बहाने लगीं.’’ जूही सुबकती हुई बोली, ‘‘वह फिर आ गई है.’’

‘‘तो क्या हुआ? तू चुप बैठ, बाकी जिम्मा मेरा,’’ वे जूही की पीठ ठोंकने लगीं. नंदा नरेंद्र के पास ही कुरसी पर बैठी थी. मांजी ने उन दोनों को घूरते हुए हरीश और नवल को भी वहीं बुला लिया. जूही ने प्यालों में चाय डाली, तो पहला घूंट ले कर ही मांजी नरेंद्र से बोलीं, ‘‘आज तुम कुछ भरेभरे लग रहे हो. मुझे आए इतने दिन हो गए. मगर तुम्हारे साथ कोई बात ही नहीं हो सकी. आज कुछ बातें करेंगे.’’

‘‘हांहां, यही मैं भी चाहता था. पहली बात तो यह कि आप कल घर को रवाना हो जाएं. खेतीबाड़ी और भैंसें देखना अकेले बापू के बस की बात नहीं है,’’ नरेंद्र बोला. ‘‘ठीक है, आई हूं तो चली भी जाऊंगी. आखिर यह भी मेरा घर है. मगर यह लड़की कौन है? अकेली तुम्हारे साथ इस के आने का कौन सा तुक है? जवान लड़कियां इस तरह घूमें, यह अच्छा नहीं है,’’ मांजी बोलीं.

‘‘मैं तो सोचता था, आप का अदब कायम रहे. पर जब आप ही नहीं चाहती हैं, तो सुनिए, यह नंदा है और मैं इस के बिना रह नहीं सकता. इस से शादी करूंगा. अब यही इस घर की मालकिन बनेगी,’’ जी कड़ा कर के नरेंद्र कह गया. नंदा गर्वभरी दृष्टि से उसे देख रही थी.

‘‘लेकिन बहू का क्या होगा? जिस के साथ सात भांवरें ले कर तुम ने अग्नि के सामने जीवनभर साथ निभाने की प्रतिज्ञा की थी?’’ मांजी ने ठंडेपन से उसे तोला. नरेंद्र की हिम्मत बढ़ गई, वह बोला, ‘‘वह ब्याह तुम लोगों की मरजी से हुआ था, तुम्हीं जानो. प्रतिज्ञा जैसे शब्द आज की दुनिया में बेमानी हो गए हैं.’’

‘‘ठीक है, कोई बात नहीं. फिर भी यह शादी न हो, तो अच्छा है. यही जूही के साथसाथ तुम्हारे और नंदा के लिए भी भला होगा,’’ मांजी ने उसी तरह कहा. ‘‘हम अपना भलाबुरा सब समझते हैं. मैं आप की यह राय मानने को मजबूर नहीं हूं,’’ नरेंद्र ने दृढ़ता से कहा.

‘‘हां, हम किसी के लिए अपनी तमन्नाओं का गला तो घोंट नहीं सकते,’’ नंदा ने पहली बार हिम्मत की. ‘‘तू चुप रह. तेरी दवा तो मैं यों कर दूंगी,’’ मांजी ने चुटकी बजाई.

उन के चुटकी बजाने से स्वयं को अपमानित अनुभव कर नंदा ने नरेंद्र की ओर देखा और कहा, ‘‘यदि मैं शादी कर ही लूं तो आप क्या कर लेंगी? अब तो शादी हो कर रहेगी.’’ ‘‘मैं क्या कर लूंगी? सुन,’’ इस के साथ ही उन की त्योरियां बदलीं और वे नरेंद्र से बोलीं, ‘‘पहले तो तुझे घर की जायदाद से वंचित कर दूंगी. दूसरे रमाबाबू से कह कर इस लौंडिया की लगाम कसूंगी. तब भी न मानी, तो इस की चोटी का एकएक बाल उखाड़ लूंगी और धक्के दे कर इसे घर से बाहर कर दूंगी. मेरी राय में इतने में सही हो जाएगी,’’ तीखी आवाज में बोलती मांजी ने नंदा के उतरे चहरे की ओर देखा.

नंदा सोच रही थी, जायदाद के लिए नरेंद्र शायद दब जाए, लेकिन उस पर इस का असर आंशिक ही पड़ा. नंदा के साथ वह नौकरी में भी गुजर कर सकता था. सो, बोला, ‘‘आप अपनी जायदाद ले जाइए, मुझे नहीं चाहिए. मगर शादी होगी.’’ ‘‘शादी तो किसी कीमत पर नहीं होगी. जायदाद जाने से भी तुझ पर असर नहीं होगा तो थानाकचहरी बना है. एक रिपोर्ट में लैलामजनूं दोनों जेल में नजर आओगे. फिर नौकरी भी नहीं बचेगी. पहली बीवी के रहते दूसरी शादी करने पर 7 साल की सजा होती है,’’ मांजी का गंभीर स्वर गूंजा.

अब नंदा का हौसला भी पस्त हो चुका था. मां ने उसे जाने को कहा तो नरेंद्र बोला, ‘‘अब जो भी हो, यह जाएगी नहीं.’’

मांजी ने नंदा का झोंटा पकड़ कर उसे ऊंचे उठा दिया. वह चीख कर गालियां बक रही थी और उसे छुड़ाने को आगे बढ़े नरेंद्र को हरीश और नवल ने पकड़ लिया था. अब नंदा मांजी से रहम की भीख मांग रही थी. उन्होंने उसे धक्के दे कर दरवाजे से निकाल कर कहा, ‘‘देह दर्द करे, तो फिर आ जाना, मरम्मत कर दूंगी.’’ छूटने पर नरेंद्र ने आगे बढ़ कर कहा, ‘‘रुको तो, नंदा.’’

पर वह कह रही थी, ‘‘नौकरी जाने के बाद तुम्हारे पास रह क्या जाएगा? मेरी इज्जत तक तो उतरवा दी. ऐसे कायर पर मैं थूकती हूं.’’ नरेंद्र को लग रहा था, वह वास्तव में नौकरी जाने के बाद कुछ भी नहीं रह जाएगा. जेल की कठोर यातनाएं सह कर वहां से छूटने के बाद दुनिया बदल चुकी होगी. वह धम्म से चारपाई पर बैठ गया.

मांजी जूही से कह रही थीं, ‘‘देखना, जो यह कलमुंही दोबारा घर की दहलीज पर पैर तक रखे. साहबजादे भी कुछ दिनों में ठीक हो जाएंगे. तुम मियांबीवी एक हो जाओगे, मैं ही कड़वी दवा रहूंगी.’’ मांजी का हाथ बहू की पीठ सहला रहा था और बहू को लग रहा था, जैसे उस की बिछुड़ी सगी मां एक हाथ में छड़ी और दूसरे में दूध का गिलास लिए हो, नारियल के फल की तरह ऊपर से कठोर, भीतर से नर्म.

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