साक्षात्कार

पारिवारिक डॉक्टरों की कमी और कठिन होता इलाज

भारत में गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा आमतौर पर नहीं मिल पाती। इसका अभाव मरीजों के अत्यधिक बोझ से दबे सरकारी अस्पतालों में तो है ही, ताम-झाम वाले निजी अस्पतालों में भी है, जहां पर रोगियों से ज्यादा महत्व अस्पताल के आर्थिक मुनाफे को दिया जाता है। पिछले हफ्ते दांत-दर्द से परेशान मेरे एक दोस्त ने दर्दनिवारक दवाई क्या खाई, वह बेचैनी महसूस करने लगे और भागे-भागे पूर्वी दिल्ली के बड़े अस्पताल की इमरजेंसी में पहुंच गए। तुरंत उनकी नस में एनएसीएल (नमक) की ड्रिप लगाई गई, कई तरह के टेस्ट के लिए खून के नमूने लिए गए और उनका एमआरआई कराया गया। इन सारी कवायदों के बाद उनकी ‘बेचैनी’ की जो वजह बताई गई, वह यह थी कि पिछले 24 घंटे में खाना न खाने और डीहाइड्रेशन (पानी की कमी) से उनका इलेक्ट्रोलाइट असंतुलित हो गया था। उन्हें 13,551.24 रुपये का बिल थमाया गया और तीन दिन बाद न्यूरोलॉजिकल (तंत्रिका संबंधी) जांच के लिए आने को कहा गया।
अस्पतालों या क्लीनिकों में बेवजह के टेस्ट व जांच-पड़ताल करवाने का यह अकेला मामला नहीं है। मेरे एक सहकर्मी की मां को बुखार में व्रत रखने के कारण जब तेज चक्कर की शिकायत हुई, तो परिजन आनन-फानन में उन्हें लेकर मध्य दिल्ली के एक बड़े अस्तपाल में पहुंचे। उनकी प्रिस्क्रिप्शन पर भी कई तरह के टेस्ट लिखे गए
और तुरंत कम से कम तीन दिनों के लिए अस्पताल में भर्ती होने की सलाह दी गई। मगर परिवार की चिंता उस वक्त ही खत्म हो गई, जब दूसरी राय जानने के लिए उन्होंने अपने पारिवारिक डॉक्टर को बुलाया। पारिवारिक डॉक्टर की नजर में चक्कर आना स्वाभाविक था, क्योंकि उन्होंने व्रत के दौरान मधुमेह की गोलियां नहीं खाई थीं। मरीज को एक गिलास ग्लूकोज का घोल पिलाया गया, और कुछ देर बाद ही वह घर लौटने के लिए तैयार थीं, जबकि अस्पताल के डॉक्टर यही रट लगाए जा रहे थे कि वापस लौटने का फैसला लेकर वह अपनी सेहत को खतरे में डाल रही हैं।
साफ है कि दोनों मामलों में यदि ‘मेडिकल हिस्ट्री’ का ख्याल रखा जाता, तो मरीजों की मुश्किलें तुरंत खत्म हो जातीं। लगातार संपर्क में रहने की वजह से पारिवारिक डॉक्टर अपने रोगी की ‘मेडिकल हिस्ट्री’ बखूबी समझते हैं, जिस कारण वह हर एक मरीज की व्यक्तिगत देखभाल कर पाते हैं। ऐसे डॉक्टर किसी तरह की अन्य जांच-पड़ताल कराने या महंगी दवा देने से पहले अपनी समझ से मरीज का आकलन करते हैं। मगर आज जब ज्यादातर डॉक्टर किसी खास विधा में विशेषज्ञ होते हैं और कई अस्पतालों में अपनी सेवा दे रहे होते हैं, तो पारिवारिक डॉक्टर की सोच भी हर बीतते दिन के साथ खत्म होती जा रही है। पिछले साल अपने एक संपादकीय में नेचर ने लिखा था कि ‘लोगों की शारीरिक परेशानियां शायद ही व्यवस्थित रूप में सामने आती हैं’। ऐसे में, इलाज करने के लिए मरीज के चिकित्सकीय इतिहास को समझना जरूरी होता है, लेकिन अस्पतालों के व्यस्त डॉक्टर इसमें आमतौर पर विफल साबित होते हैं। रोजाना करीब 90 फीसदी मर्ज कटने, रगड़ खाने, मामूली संक्रमण और दस्त, सर्दी व वायरल बुखार आदि के कारण होते हैं। मल्टीस्पेशलिटी अस्पतालों में डॉक्टरों को अपना ध्यान हृदयाघात, मस्तिष्काघात, कैंसर, निमोनिया जैसी गंभीर बीमारियों पर लगाना चाहिए, लेकिन दुर्भाग्य से अत्यधिक पढ़े-लिखे सर्जन और आपात स्थिति को संभालने वाले दक्ष डॉक्टरों का भी ज्यादातर समय बुखार और पेट-दर्द का इलाज करने में जाया होता है।
साल 2017 में कुल आबादी के लिए देश में सिर्फ 10,41,395 पंजीकृत एलोपैथिक डॉक्टर थे। प्रसूति व बाल देखभाल, टीकाकरण, पुरानी बीमारियों का प्रबंधन, बुजुर्गों की सहायता जैसी 90 फीसदी स्वास्थ्य सेवाएं प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा के अंतर्गत मिलनी चाहिए, इसीलिए दिल्ली में मोहल्ला क्लीनिक और आयुष्मान भारत के तहत हेल्थ ऐंड वेलनेस सेंटर जैसी पहल की गई है। लेकिन जब तक ये केंद्र पूरी तरह सक्रिय नहीं हो जाते, तब तक सभी लोगों को ऐसे पारिवारिक डॉक्टर की खोज जरूर कर लेनी चाहिए, जो आपात स्थिति में उन्हें सही सलाह दे सकें। इसके अलावा, सबको अपनी ‘मेडिकल हिस्ट्री’ की कॉपी भी साथ में रखनी चाहिए। जिन लोगों के पास स्वास्थ्य बीमा है, उन्हें तो हेल्थ कार्ड की सॉफ्ट कॉपी या फोटोग्राफ साथ में रखना ही चाहिए।

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