राजनीति

बदलाव या बरकरार… जारी है तकरार

कांटे नहीं कटते ये दिन ये रात…. कुछ एेसी स्थिति उन लोगों की है जो राजनीति में गहरी रुचि रखते हैं। सभी को 11 दिसंबर का बेसब्री से इंतजार है आपस में बहस इसी बात पर है कि प्रदेश में सरकार बदलेगी या बरकरार रहेगी।दरअसल, प्रदेश में संपन्न हुए विधानसभा के चुनाव राजनैतिक विश्लेषकों केलिए रिसर्च करने के लिए एक अवसर के रूप में है इस समय जिसके भी तर्क सुनेंगे उसी का जीत तय मान जाएंगे। जो सीटें प्रत्याशियों की घोषणा के समय हारी हुई मानी जा रही थी आज गुणा-भाग में जीती हुई लग रही है और जीती हुई मानी जा रही थी उनकी आज हार की संभावनाएं दिख रही है। वैसे तो प्रदेशव्यापी माहौल शुरूआत में ही वक्त है बदलाव का बन गया था लेकिन कांग्रेस के टिकिट वितरण और बाद में कांग्रेस नेताओं की आक्रामकता में कमी आने के बाद बदलाव की हवा आंधी-तूफान का रूप नहीं ले पाई। वहीं भाजपा ने अपने मैनेजमेंट के माध्यम से भी सत्ता विरोधी वोटों का खूब बंटवारा करवाया। लेकिन जहां जहां कांग्रेस के प्रत्याशी अपनी-अपनी जीत की हवा बना ले गये वहां पर वोटों का बंटवारा इस स्तर पर नहीं हुआ।बहरहाल, प्रदेश में 15 वर्षों के बाद सत्ता में वापसी के सपने देख रही कांग्रेस को इस समय ईवीएम मशीनों की निगरानी वोटों से ज्यादा करनी पड़ रही है। इस बार कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं को पूरी उम्मीद है कि सत्ता में पार्टी की वापसी होगी। अधिकांश राजनैतिक विश्लेषकों को भी माहौल में एेसा ही कुछ दिखाई दिया लेकिन जैसा कि होता है। राजनीति एक नहीं कई कोणों से सोचा जाता है मसलन मैदान में जब कम प्रत्याशी होते हैं तब सत्ता विरोधी वोटों का बंटवारा नहीं होता लेकिन जब ज्यादा प्रत्याशी होते हैं तो सत्ता विरोधी वोट बंट जाते हैं। प्रदेश में सत्ता विरोधी माहौल जिस अनुपात में बना था उसी अनुपात में दमदार प्रत्याशी भी मैदान में थे सपा, बसपा, आप, सपाक्स, गोंगपा के साथ-साथ कहीं-कहीं निर्दलीय भी दमदारी से चुनाव लड़ रहे थे जो कि समीकरणों के गड़बड़ाने के लिए काफी थे। यही कारण है इन सीटों पर जीत-हार के समीकरण इस कदर गड़बड़ाये है कि यह भी तय करना मुश्किल हो रहा है कि पहले दूसरे तीसरे और चौथे स्थान पर कौन रहेगा। दमोह जिले की पथरिया विधानसभा, रायसेन जिले की सिलवानी विधानसभा, उज्जैन उत्तर, जबलपुर उत्तर एेसी कुछ सीटें हैं जहां कोई किसी से कम नहीं। यदि सीटों पर भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला होता तब तय करना आसान था कि आखिर कौन जीत रहा है।

कुल मिलाकर पूरा चुनाव माहौल और मैनेजमेंट के बीच ही रहा। बुधवार को वल्लभ भवन में केबिनेटकी बैठक के बाद भी अधिकारी मंत्रियों के चेहरों पर जहां हवाईयां उड़ी हुई थी। कुछ के चेहरे जीत के भाव दिखा रहे थे। मुख्यमंत्री चौहान जरूर पत्रकारों से चर्चा के दौरान आत्मविश्वास दिखाते नजर आये लेकिन एक पखवाड़े तक पूरे प्रदेश में जो माहौल दिखा उससे तकरार 11 दिसंबर तक चलेगी ही कि सरकार में बदलाव होगा या बरकरार रहेगी।

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