राजनीति

भ्रष्टाचार से ऐसी चुनिंदा लड़ाई

भारतीय जनता पार्टी सभी विपक्षी पार्टियों को भ्रष्ट बता कर लोकसभा चुनाव लड़ने उतर रही है। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा से प्रवर्तन निदेशालय की पूछताछ को भाजपा ने बड़ा मुद्दा बनाया है। सोशल मीडिया में चल रहे प्रचार को भाजपा के प्रवक्ता ने प्रेस कांफ्रेंस में दोहराया। उन्होंने कहा कि प्रियंका गांधी वाड्रा इकलौती नेता हैं, जिनके ससुराल वाले और मायके वाले सब जमानत पर हैं।
ऐसा नहीं है कि भ्रष्टाचार को लेकर ऐसा निजी हमला सिर्फ कांग्रेस या गांधी परिवार पर किया जा रहा है। भाजपा ने हर नेता पर निजी हमला किया है। राजद के नेता तेजस्वी यादव ने जब वाड्रा के मुद्दे पर केंद्र सरकार को निशाना बनाया तो भाजपा के प्रवक्ता ने कहा कि तेजस्वी खुद जमानत पर छूटे हैं और उनसे पूछा कि वे बताएं कि उनके पिता लालू प्रसाद जेल क्यों काट रहे हैं। इसी किस्म का निजी हमला ममता बनर्जी पर हुआ है। भाजपा के शीर्ष नेताओं ने किया है।
अखिलेश यादव और मायावती पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए निजी हमले किए गए हैं। भाजपा इस विमर्श को कैसा रूप देना चाहती है, यह राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के ऊपर चर्चा के दौरान दिखा, जब चर्चा की शुरुआत करने वाले भाजपा के नेता हुकुमदेव नारायण यादव ने कहा कि एक तरफ धर्म का नेतृत्व नरेंद्र मोदी कर रहे हैं तो दूसरी ओर अधर्म का गठबंधन बना है।
उन्होंने अपने भाषण में विपक्षी गठबंधन को चोरों, लुटेरों का गठबंधन कहा, जो जनता के बीच नरेंद्र मोदी और अमित शाह कह रहे हैं।
भ्रष्टाचार के मुद्दे पर चल रही जांच और कार्रवाइयों को लेकर सबसे पहला सवाल तो यह उठता है कि सरकार पांच साल तक क्या करती रही? जब खुद नरेंद्र मोदी ने कहा था कि सरकार बनने के बाद वे सबसे पहले ऊपर से सफाई करेंगे तो उसमें इतनी देरी क्यों हुई कि ऐन लोकसभा चुनाव से पहले कार्रवाई हो रही है? केंद्र सरकार ने पिछले हफ्ते पी चिदंबरम के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी दी। सवाल है कि यह मंजूरी अभी तक क्यों रूकी हुई थी?
मायावती को मुख्यमंत्री पद से हटे हुए सात साल होने जा रहे हैं तो अब उनके कार्यकाल में हुए कथित स्मारक घोटालों की जांच के लिए छापे मारे जा रहे हैं! अखिलेश यादव के राज में हुए कथित रेत घोटाले की जांच के लिए छापे मारे जा रहे हैं। यूपीए के राज के समय से चिटफंड घोटालों की जांच हो रही है। पिछले पांच साल तक यह जांच कछुआ चाल से चलती रही है पर अचानक इसमें तेजी आई है और तृणमूल कांग्रेस व बीजू जनता दल के नेताओं सहित अधिकारियों और यहां तक की फिल्म निर्माताओं तक के यहां छापे, पूछताछ और गिरफ्तारियों का सिलसिला शुरू हो गया है। एक तरफ राफेल मामले में जांच नहीं हो इसके लिए सारे प्रयास हो रहे हैं तो दूसरी ओर गड़े मुर्दे उखाड़ कर जांच किए जा रहे है तो क्या इसका मतलब लोगों की समझ में नहीं आ रहा होगा?
जांच में कब तेजी आई है, इस सवाल के साथ साथ यह सवाल भी कम अहम नहीं है कि निशाना किसको बनाया जा रहा है? सारी जांच के दायरे में सिर्फ विपक्षी पार्टियों के नेता हैं। सत्ता पक्ष की पार्टियों या नेताओं में से किसी के खिलाफ जांच नहीं हो रही है। यूपीए दो की सरकार में सारी जांच सत्तारूढ़ कांग्रेस या उसकी सहयोगी पार्टियों के नेताओं की ही हुई थी। उसके उलट मौजूदा सरकार में जांच से बचने का सबसे आसान रास्ता यह है कि नेता सत्तारूढ़ पार्टी में शामिल हो जाए। जिस चिटफंड घोटाले में तृणमूल कांग्रेस और बीजू जनता दल के नेताओं की शामत आई है उसी में हिमंता बिस्वा सरमा भी आरोपी थे। पर जैसे ही कांग्रेस छोड़ कर वे भाजपा में गए, वैसे ही पाक दामन हो गए। इसी मामले के आरोपी मुकुल रॉय भी तृणमूल छोड़ कर भाजपा में जाते ही पाक साफ हो गए। व्यापमं से लेकर ललित मोदी तक और छत्तीसगढ़ के चावल घोटाले से लेकर राफेल तक भाजपा की राज्य सरकारों और केंद्र सरकार के खिलाफ अनेक मामलों में आरोप लगे, लेकिन किसी भी जांच कराने की जरूरत भी नहीं महसूस की गई।
जांच शुरू होने और भ्रष्टाचार पर कार्रवाई की टाइमिंग को लेकर चौतरफा सवाल उठ रहे हैं। अगर सरकार और भाजपा ने यह चुनावी नैरेटिव बनाया है कि विपक्ष भ्रष्ट है और नरेंद्र मोदी भ्रष्टाचार मिटाने की अपनी प्रतिबद्धता के तहत कार्रवाई कर रहे हैं तो दूसरी ओर विपक्षी पार्टियां भी यह जवाब दे रही हैं कि विपक्षी एकता से घबराई भाजपा केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग करके विपक्षी पार्टियों को निशाना बना रही है।
भ्रष्टाचार पर कार्रवाई का मैसेज जितना प्रभावी है उससे ज्यादा असर इस प्रचार का है कि चुनाव से पहले विपक्ष को परेशान किया जा रहा है।
अभी केंद्रीय एजेंसियों की अति सक्रियता से यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या वे पांच साल तक सोई रहीं, जो अब अचानक सक्रिय हुई हैं? यह भी पूछा जा रहा है कि भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए लोकपाल बनाने का फैसला पांच साल तक नहीं हुआ तो अब कैसे इस लड़ाई का नैरेटिव बनाया जा रहा है? वैसे भी कहावत है कि काठ की हांडी दोबारा चुल्हे पर नहीं चढ़ती। जब भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए लोगों ने भाजपा को पूर्ण बहुमत दिया तो पांच साल बाद फिर उसी मुद्दे पर लोग कैसे वोट करेंगे?

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *