राजनीति

‘ममता’ बनाए माहौल फसल काटेंगे ‘राहुल’!

ममता बनर्जी का सीबीआई पर अनावश्यक हस्तक्षेप का आरोप और मोदी सरकार के खिलाफ धरने पर बैठने से राजनीति का गरमाना तय था और ऐसा हुआ भी.. सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुके इस हाई वोल्टेज पॉलिटिकल डेवलपमेंट कहें या फिर ड्रामे और हाई प्रोफाइल मामले की गूंज संसद के अंदर ही नहीं, सड़क पर भी सुनाई दे रही है.. एक ओर मोदी सरकार के मंत्री और अमित शाह की टीम के नेता ममता के साथ कांग्रेस खासतौर से राहुल गांधी को लपेट रहे.. तो ममता के समर्थन में राहुल गांधी ही नहीं राज्यों के महारथी मोदी-शाह विरोधी नेता भी खुला समर्थन देकर लामबंद हो रहे..

ममता ने साफ कर दिया है कि वो झुकेंगी नहीं.. इस बीच पहले ही चेतावनी दे चुके सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को चिटफंड घोटाले के सबूत के साथ नए सिरे से सुनवाई शुरू हो सकती है.. यहीं पर एक साथ कई सवाल खड़े होते हैं कि जो भी माहौल दिल्ली से लेकर पश्चिम बंगाल में बन रहा और राज्यों की राजनीति में क्षत्रप अपनी सुविधा से सियासत गरमा रहे.. फिलहाल उसका केंद्र बिंदु मोदी वर्सेस ममता बन चुका है..

ऐसे में एक ओर धरना राणेसिद्धि में समाजसेवी अन्ना हजारे का लोकपाल के मुद्दे पर गौर करने लायक है, जिन्होंने पद्मभूषण अवॉर्ड लौटाने की सशर्त समय सीमा तय कर दी है.. ऐसे में बड़ा सवाल मोदी-शाह विरोधी महागठबंधन जब राज्यों में उलझकर रह गया तब क्या ममता बनर्जी ने मायावती को पीछे छोड़ कर मोदी के मुकाबले सबसे प्रभावी और मजबूत पोजिशन ले ली है या फिर इसकी हवा निकलने वाली है..

लाख टके का सवाल जो माहौल ममता बनर्जी ने बनाया और इससे यदि बीजेपी और एनडीए बैकफुट पर आए तो क्या मोदी विरोधी खेमे से ममता बनर्जी पीएम इन वेटिंग की सबसे मजबूत दावेदार के तौर पर सामने आएंगी.. ऐसे में अन्ना हजारे से लेकर ममता बनर्जी हों या फिर सधे हुए कदमों से अखिलेश यादव को भरोसे में लेकर आगे बढ़ रही बसपा सुप्रीमो मायावती अपने-अपने राज्यों में जो सियासी माहौल बनाएंगे उसकी फसल अंततः क्याकांग्रेस और राहुल गांधी काटेंगे.. या फिर महागठबंधन के फेल होने और त्रिकोणीय आंतरिक संघर्ष का फायदा सिर्फ और सिर्फ नरेंद्र मोदी को मिलने वाला है.. फिलहाल जिनके सामने ना कोई एक दल चुनौती देने की स्थिति में है ना ही कोई स्वीकार नेता..

मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान भाजपा शासित राज्यों में मिली सत्ता से उत्साहित कांग्रेस का जोश देखने लायक तो राहुल गांधी फ्रंट फुट पर खेलने की बात कर रहे .. उधर निश्चिंत बेफिक्र और बुलंद इरादों के साथ मोदी-शाह की जोड़ी नई चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए लोकसभा चुनाव की बिसात बिछा रही.. तब अचानक ममता बनर्जी की धमाकेदार रीएंट्री ने देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है, जो पश्चिम बंगाल के पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार के बचाव में अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ गईं..

तो मीडिया का पूरा फोकस ममता पर बन गया और इसी के साथ पीछे छूटते नजर आए दूसरे मुद्दे और कार्यक्रम.. चाहे फिर वह कुंभ के दौरान राम मंदिर को लेकर गरमाया माहौल का ठंडा पड़ना हो, अन्ना हजारे का लोकपाल को लेकर एक और आंदोलन हो या फिर कांग्रेस की नई राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी की लांचिंग.. जो अमेरिका से भारत लौट चुकी और राहुल गांधी के 8 फरवरी के भोपाल दौरे से एक दिन पहले महासचिव के तौर पर प्रियंका गांधी राहुल गांधी और कांग्रेस की बैठक में पहली बार शामिल होंगी..

यही नहीं, देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की सपा से तालमेल को लेकर चुनाव मैदान में जा रही बसपा सुप्रीमो की चुप्पी भी गौर करने लायक है.. जो भाजपा के साथ कांग्रेस को भी निशाने में लगातार ले रही ..जब अरविंद केजरीवाल से लेकर राहुल गांधी जैसे घोर विरोधी ममता को एक साथ समर्थन दे रहे और विपक्ष की रणनीति बनाने का जिम्मा चंद्रबाबू नायडू के साथ एनसीपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद पवार ने संभाल लिया है..

तब “मर जाऊंगी लेकिन झुकूंगी नहीं” की बात कहकर ममता बनर्जी ने अपनी दृढ़ता के साथ अपने इरादे जता दिए.. मुद्दा भ्रष्टाचार से आगे बढ़ते हुए संघीय ढांचे पर चोट के आरोप-प्रत्यारोप तक पहुंच चुका है.. तकनीकी खामियों से लेकर संवैधानिक खामियां और पेंच की आड़ में पलटवार से इनकार नहीं किया जा सकता है.. तब सियासी मोर्चे पर जो संदेश निकलकर सामने आया उससे साफ है कि 2019 लोकसभा चुनाव को लेकर मोदी हों या फिर ममता अपने सियासी हित साधने का कोई मौका हाथ से देना नहीं चाहते..

ऐसे में पॉलिटिक्स के अंदर टाइमिंग और परसेप्शन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.. सवाल क्या सीबीआई के इस फैसले ने विरोधियों को एकजुट होने का मौका दे दिया है, तो फिर सवाल क्या इसकी अगुवाई कर रही ममता बनर्जी की गिनती मोदी की सीधी मुखालफत करने बाद एक दबंग और अनुभवी नेता के तौर पर दूसरों चाहे पर मायावती हो या राहुल गांधी का रास्ता बंद कर देगी.. ममता बनर्जी के समर्थन में वह सभी राजनीतिक दल और उनके नेता खुलकर सामने आ चुके हैं, जो पिछले दिनों ममता की रैली में शामिल हुए थे..

नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी का कॉन्फिडेंस भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है, जो लोकसभा चुनाव को लेकर कोई जोखिम लेने को तैयार नहीं हैं.. पिछले चुनाव में जिन राज्यों में उन्हें निर्णायक बढ़त मिली थी यदि वहां सीटों का ग्राफ गिरता है तो उसकी भरपाई के अतिरिक्त विकल्प की तलाश में दोनों जुट चुके हैं, जो उत्तर प्रदेश में मायावती और अखिलेश के साथ आने से न सिर्फ हैरान-परेशान हैं, बल्कि नए सिरे से चुनावी रणनीति बनाने को मजबूर हुए.. उन्हें शायद पश्चिम बंगाल में संभावनाएं ज्यादा नजर आ रही हैं..
सवाल यह कि ममता के ये तीखे तेवर और सख्त रुख क्या महागठबंधन या फिर तीसरे मोर्चे को ताकत देगा या फिर यह माहौल बनाने का बड़ा मकसद ममता का पश्चिम बंगाल में अपनी पुरानी सीटों पर कब्जा बरकरार रखने तक सीमित है, आखिर ममता का यह आंदोलन क्या गुल खिलाएगा ..तो सवाल क्या ममता बदलते हालात में कांग्रेस के लिए पश्चिम बंगाल में कुछ सीट छोड़कर मोदी विरोधी महागठबंधन को असरदार साबित करेंगी..
सपा और बसपा उत्तर प्रदेश में पहले ही तालमेल कर कांग्रेस से दूरी बनाने के संकेत दे चुकी है, जहां प्रियंका को राष्ट्रीय महासचिव बनाकर कांग्रेस फ्रंट फुट पर खेलने का मानस बना चुकी है तो फिर नया सवाल यहीं पर खड़ा होता है, जो माहौल ममता बनर्जी ने बनाया और यदि दांव चल गया तो इसका फायदा सिर्फ ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल में मिलेगा या फिर मोदी और शाह के खिलाफ माहौल बनने का फायदा दूसरे राज्यों में भी इनके विरोधियों को मिलेगा..
ममता बनर्जी का दबदबा पश्चिम बंगाल से लेकर पूर्वोत्तर के राज्य तक ही सीमित नजर आता है.. ऐसे में ज्यादातर राज्यों में भाजपा और एनडीए विरोधी दलों के भी इसका फायदा और नुकसान उठाने से इंकार नहीं किया जा सकता तो फिर सवाल 2014 के पहले जो माहौल दिल्ली में आमरण अनशन पर बैठ कर अन्ना हजारे ने मनमोहन सरकार के खिलाफ बनाया था और उसकी सियासी फसल अरविंद केजरीवाल ने ही नहीं, बल्कि नरेंद्र मोदी ने मनमोहन सरकार के खिलाफ सीधा मोर्चा खोलकर काटी थी..
क्या यह स्थिति फिर बन सकती या फिर मोदी की बरकरार लोकप्रियता के कारण इसकी संभावना दूर-दूर तक नजर नहीं आती.. फिर भी यदि मोदी-शाह विरोधी लामबंद होते जाते हैं और भाजपा से सीधे मुकाबले में राज्यों की प्रतिस्पर्धा छोड़कर परदे के पीछे ही सही गठबंधन और अंडरस्टैंडिंग की कोई रणनीति यदि कारगर सिद्ध होती है तो फिर इसका फायदा आखिर किसे मिलेगा..
क्या ममता बनर्जी और मायावती अपने-अपने राज्यों में लोकसभा की कितनी सीट गठबंधन के इस दौर में लेकर आएंगे, जो कांग्रेस समेत सभी मोदी विरोधी दल उनके पीछे आकर खड़े हो जाएं या फिर इसका सीधा फायदा उस कांग्रेस और राहुल गांधी को ही मिलेगा, जो अलग-अलग राज्यों में चुनाव के लिए नए फार्मूले के साथ मैदान में जा रही है वह भी फ्रंट फुट पर खेलने के इरादे के साथ..

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