साक्षात्कार

योगी आदित्यनाथ को बंगाल में उतार कर भाजपा ने चली है दोहरी चाल

उत्तर प्रदेश के नेताओं के साथ ममता दीदी का रवैया प्रदेश के लोगों को रास नहीं आ रहा है। उत्तर प्रदेश की जनता में ममता के प्रति जबर्दस्त नाराजगी है। योगी के अपमान को यूपी का अपमान बताया जा रहा है।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का धरना खत्म हो गया है। ममता जब कोलकाता में धरने पर बैठीं तो उसकी गूंज उत्तर प्रदेश तक सुनाई दी। ममता के धरने वाले ‘पंच’ में उत्तर प्रदेश के कई दिग्गज फंसे नजर आ रहे हैं। यूपी के चार बड़े नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और बसपा सुप्रीमो मायावती तथा सपा प्रमुख अखिलेश यादव, ममता की सियासत का मोहरा बन गये। वहीं कांग्रेस अध्यक्ष और अमेठी के सांसद राहुल गांधी भी ममता की सियासत के सामने बैकफुट पर नजर आए। एक तरफ ममता ने धरने के माध्यम से भाजपा के तमाम नेताओं को आईना दिखाने की कोशिश की तो दूसरी तरफ धरने के माध्यम से वह अपनी प्रधानमंत्री पद की दावेदारी भी मजबूत करती नजर आईं। ममता ने प्रधानमंत्री पद की दावेदारी मजबूत करने की कोशिश की तो यूपी से सांसद और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं कांग्रेस अध्यक्ष तथा प्रधानमंत्री की कुर्सी के दावेदार समझे जा रहे राहुल गांधी और गैर भाजपा, गैर कांग्रेस के सहारे प्रधानमंत्री की कुर्सी के लिए अपनी पकड़ मजबूत करने में लगीं बसपा सुप्रीमो मायावती को ममता की यह बात रास नहीं आई। सबने अपने−अपने ढंग से रिएक्शन दिया।
खैर, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से ममता की अदावत जगजाहिर है। मोदी के सहारे भाजपा बंगाल में हिन्दुत्व की अलख जगाए हुए है। इसीलिए ममता दीदी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित भाजपा के किसी भी नेता का बंगाल आना पसंद नहीं आता है। ममता पीएम मोदी से क्यों परेशान थीं। इस बात का अहसास तब हुआ जब मोदी की रैली में जनसैलाब उमड़ पड़ा। मोदी की तरह ही अमित शाह भी बहुत मुश्किल से बंगाल में घुस पाए थे। हिन्दुत्व का चेहरा समझे जाने वाले यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ के लिये भी ममता दीदी ने हवा−पानी और सड़क सभी जगह अवरोध खड़े किए। इसको लेकर योगी पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी पर हमलावर भी रहे। बंगाल में घुसने नहीं दिए जाने के कारण योगी को एक जनसभा तो टेलीफोन से संबोधित करनी पड़ गई। हाँ, यह और बात थी कि योगी ने हार नहीं मानी। भारी दबाव के बीच टीएमसी नेताओं को चकमा देते हुए वह पुरूलिया में एक जनसभा करने पहुंच ही गए। जहां उन्होंने ममता को खूब खरी−खरी सुनाई।
उत्तर प्रदेश के नेताओं के साथ ममता दीदी का रवैया प्रदेश के लोगों को रास नहीं आ रहा है। उत्तर प्रदेश की जनता में ममता के प्रति जबर्दस्त नाराजगी है। योगी के अपमान को यूपी का अपमान बताया जा रहा है, लेकिन समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव इन सब बातों से बेपरवाह होकर ममता बनर्जी का समर्थन करते हुए भाजपा पर ही हमलावर हैं। अखिलेश जो स्वयं खनन घोटाले सहित कई भ्रष्टाचार के चलते सीबीआई के रडार पर हैं, उन्हें यही लगता है कि केन्द्र की मोदी सरकार विरोधियों को डराने के लिये सीबीआई और ईडी का सहारा ले रही है।
गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में शारदा चिटफंड घोटाले में एसआईटी जांच के प्रमुख रहे राजीव कुमार से सीबीआई की पूछताछ की कोशिशों को लेकर कोलकाता में राजनीति जोरों पर है। पहले जांच को पहुंचे सीबीआई अधिकारियों को हिरासत में लिया गया और फिर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ही धरने पर बैठ गईं। जब ममता धरने पर बैठीं तो कोलकाता पुलिस कमिश्नर का कार्यभार संभाल रहे राजीव कुमार भी उन्हीं के साथ धरने पर बैठ गए। उन्होंने अपने सर्विस रूल्स की जरा भी चिंता नहीं की। ममता का धरना कई सवाल खड़ा कर रहा था, लेकिन इन सब बातों की चिंता छोड़कर समूचा विपक्ष ममता के साथ खड़ा दिखा। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से लेकर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव, आन्ध्र प्रदेश के सीएम चन्द्रबाबू नायडू और राजद नेता तेजस्वी व भाजपा के बागी नेता भी ममता के समर्थन में हुंकार भरते रहे, लेकिन ममता दीदी के समर्थन में बहन मायावती जी का कहीं नहीं दिखना रहस्यमय बना हुआ है।
खबर चली कि ममता बनर्जी के धरने को मायावती ने फोन करके समर्थन दिया था, लेकिन सार्वजनिक तौर पर इस बात की पुष्टि नहीं हो पाई। मायावती खुले तौर पर ममता के समर्थन में नहीं दिखती हैं। मायावती की चुप्पी के चलते अखिलेश कुछ असहज भी नजर आ रहे हैं, लेकिन राजनैतिक रूप से अनुभव के मामले में अखिलेश, बसपा सुप्रीमो के आसपास भी नजर नहीं आते हैं। सब जानते हैं कि मायावती बहुत सोच−समझकर ही सियासी चाल चलती हैं, उनकी राजनीतिक समझ अच्छी है। एक तो बंगाल में मायावती या फिर उनकी बहुजन समाज पार्टी का जनाधार भी नहीं है, इसलिए वह उदासीन बनी हुई हैं दूसरे वह ममता को समर्थन देकर प्रधानमंत्री के रूप में उनकी दावेदारी को मजबूती नहीं प्रदान करना चाहती हैं। इसके अलावा मायावती भ्रष्टाचार के पक्ष में खड़ी नहीं दिखना चाहती हैं। भले ही उनकी सरकार के समय हुए स्मारक घोटाले की जांच चल रही हो। कभी−कभी तो ऐसा लगता है कि चुनाव के बाद के गणित को ध्यान में रखकर मायावती भाजपा के प्रति अभी नरम रवैया अख्तियार कर रही हैं।
उत्तर प्रदेश से ही आने वाले एक और बड़े नेता राहुल गांधी भी ममता की गुगली को समझ नहीं पा रहे हैं। हालात यह है कि एक तरफ पश्चिम बंगाल के कांग्रेसी नेता शारदा चिटफंड घोटाले में ममता के खिलाफ सीबीआई की सख्ती को सही ठहरा रहे हैं, वहीं कांग्रेस की केन्द्रीय इकाई एक तरफ सीबीआई की कार्रवाई के बहाने ममता का समर्थन करते हुए मोदी को घेरने में लगी है। दूसरी तरफ उसके नेता यह भी कह रहे हैं कि शारदा चिटफंड घोटाले की जांच होनी चाहिए। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को भी ममता की प्रधानमंत्री पद के लिए दावेदारी रास नहीं आ रही है।
बात भाजपा की कि जाये तो सपा−बसपा गठबंधन के बाद पार्टी को उत्तर प्रदेश में बड़ा नुकसान होते दिखे रहा है, जिसकी भरपाई भाजपा पश्चिम बंगाल से करना चाहती है। इसीलिए पश्चिम बंगाल में भाजपा को मजबूत करने की जिम्मेदारी मोदी−शाह के अलावा योगी आदित्यनाथ के भी कंधों पर डाली गई है। भाजपा की कोशिशों से कुछ हद तक बंगाल में हिंदू पोलराइज भी हुए हैं। भाजपा आलाकमान का मानना है कि अगर हिंदू पोलराइजेशन होता है तो पार्टी को पश्चिम बंगाल में 42 में से 25 सीटें मिल सकती हैं, अन्यथा बंगाल अभी दूर है।

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