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राहुल के सम-भाव का सबसे बड़ा इम्तहान – Rashtriya Pyara
राजनीति

राहुल के सम-भाव का सबसे बड़ा इम्तहान

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एक महीने से कांग्रेसी क्षितिज पर तरह-तरह के रंगों के छींटे देख कर मेरी आंखें चकित भी हैं और व्यथित भी। राहुल गांधी कांग्रेस-अध्यक्ष बने रहने को तैयार नहीं हैं। वे तैयार हो जाएं, इसके लिए कांग्रेस ज़्यादा कुछ करती दिखाई भी नहीं दे रही है। पिछले महीने के अंतिम शनिवार को कांग्रेस की कार्यसमिति में राहुल ने इस्तीफ़ा दिया तो उसे एकमत से नामंज़ूर करने की औपचारिकता भले ही उसी वक़्त पूरी हो गई, मगर इसके बाद राहुल की ना से कहीं कोई हंगामा नहीं बरपा। राहुल का दुःख सब का दुःख क्यों नहीं बन रहा? यह समूची कांग्रेस का साझा दुःख क्यों नहीं है? ठीक है कि राहुल ने एक बार नहीं, कई-कई बार साफ़ कर दिया कि अब वे नहीं मानेंगे तो नहीं मानेंगे, मगर मुझे ताज्जुब इस बात का है कि राहुल के फ़ैसले से कांग्रेस की पैदल-सेना में पैदा हुई गहरी बेचैनी की चिनगारियां तेज़ी से भड़कीं क्यों नहीं? हम सब ने देखा है कि ऐसे मौक़ों पर तो कांग्रेसी, बिना किसी के कहे, अपने-आप घरों से निकल पड़ते हैं। और, ऐसे भी मौक़े आए हैं कि जब वे ख़ुद घरों से नहीं निकले हों तो क्षत्रपों के संकेत का एक बटन दबते ही पूरे मुल्क़ में भावनाओं के दावानल फूटने लगते हैं।

इस बार ऐसा क्यों नहीं हुआ? क्या राहुल की सियासी स्व-समाधि इतनी मामूली घटना है कि कांग्रेसी समंदर में हलका-सा भी ज्वार न आए? क्या हम आंख मूंद कर यह यक़ीन कर लें कि देश भर में कांग्रेस की ज़मीन पर कहीं ऐसा कोई मौजूद नहीं है, जिसका चित्त राहुल की विदा-घोषणा से व्याकुल नहीं है? अगर ऐसा नहीं है तो फिर इन आंसुओं का बहाव किन घूरती आंखों के इशारों ने सुखा डाला? इस विलाप की आवाजे़ं किन कोठरियों में क़ैद हो गईं? लोकसभा के चुनाव-अभियान में राहुल के जुझारूपन पर फ़िदा टोलियां किन की गोद में समा गईं?

जो कांग्रेस को जानते हैं, वे खूब जानते हैं कि यह सन्नाटा ऐसे ही नहीं पसरा हुआ है। इस एक महीने में बहुतों ने बहुतों के मन में लड्डू फूटते देखे हैं। चलाना-वलाना तो बाद की बात है, 134 बरस पुरानी पार्टी की उस कुर्सी पर, जिस पर एक-से-एक कद्दावर बैठे, नाम के लिए ही सही, बैठने को ऐसे-ऐसों की आत्मा फुदक रही है, जिन्हें उनके गली-मुहल्ले में भी कोई आते-जाते सलाम नहीं करता है। मेरा तो बीता ही है, आपका भी यह पूरा महीना ऐसे तमाम लार-टपकाउओं के दीदार करते बीता होगा। इन लोगों की चिंता कांग्रेस को इस अंधेरे कोने से खंीच कर बाहर लाने की नहीं, पगड़ी-रस्म में अपना-अपना सिर घुसाने की है। वे सब ‘मन-मन भावे, मूड हिलावे’ की आसन-मुद्रा साधे बैठे हैं।

यह कांग्रेसियों की इस नस्ल की वीभत्स मतलबपरस्ती का दौर है। इन अलीबाबाओं को लग रहा है कि कांग्रेस के शुभंकर राहुल गांधी की विदाई के आसार ने उनके लिए सिमसिम-गुफ़ा का दरवाज़ा खोल दिया है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि आपके बनाए राक्षस आपको ही खाने दौड़ने लगते हैं। कांग्रेस ऐसे ही समय से गुज़र रही है। मैं बिना ग्रह-नक्षत्रों की गणना के भी यह भविष्यवाणी कर सकता हूं कि अगर राहुल ने कांग्रेस का नेतृत्व करते रहने के अपने बुनियादी कर्तव्य-बोध पर ख़ुद की आहत भावनाओं को हावी रहने दिया तो 2020 के पहले दिन का सूरज उगते-उगते कांग्रेस की सूरत पहचान में आने लायक़ भी नहीं रहेगी। इसलिए यह आनाकानी का नहीं, पूरी कांग्रेस का तिया-पांचा एक कर उसे सड़ांध मारती बावड़ी से खींच कर बाहर लाने का वक़्त है।

जो भी यह सोचता है कि कोई भी अध्यक्ष बने, कांग्रेस आगे बढ़ती रहेगी, वह महामूर्ख है। किसी भी राजनीतिक संगठन का मुखिया सिर्फ़ रूप-मूर्ति नहीं होता है। वह एक ऊर्जा-स्त्रोत होता है–निराकार ऊर्जा-पुंज। भारत की लोक-आस्था में चाहे जो यह स्थान प्राप्त नहीं कर सकता। ख़ासकर आज के ज़माने में तो बिल्कुल नहीं। राहुल आहत हैं कि उनके अपने भी उनकी राह पर चलने को तैयार नहीं दीखते। उनकी व्यथा है कि उनके हमजोली भी उनकी सुनने को राज़ी नहीं लगते। उनका संताप है कि बहुत-से लोग ऐसा दिखावा कर रहे हैं, जैसे कुछ हुआ ही न हो और अपनी जवाबदेही से बच रहे हैं। इसलिए राहुल ने जवाबदेही की शुरुआत ख़ुद से कर दी।

राजनीति की दुनिया है ही ऐसी कि इसमें रिश्ते इतने कच्चे होते हैं। इससे क्या दुःखी होना? राहुल को समझना चाहिए कि हमारा इच्छा-स्वातंत्र्य तो हमेशा हमारे साथ होता है, मगर हम अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए हमेशा स्वतंत्र नहीं हैं। कांग्रेस का नेतृत्च छोड़ने की अपनी इच्छा पर डटे रहने का यह मौजूं वक़्त नहीं है। यह तो ग़लत बातों के खि़लाफ़ दृढ़ता दिखाने का वक़्त है। नरेंद्र भाई मोदी की हाहाकारी उपस्थिति से दो-दो हाथ करने का अद्भुत माद्दा रखने वाले राहुल अपनी पार्टी के भीतरी खोखलेपन को दुरुस्त करते समय भावुक होने लगेंगे तो कैसे काम चलेगा? बिना किसी मुनादी और नगाड़ेबाज़ी के काम करने का हुनर सबको नहीं आता। राहुल को यह आता है। यह कहने वाले तो रहेंगे कि आज कांग्रेस की इस हालत के लिए राहुल भी इसलिए ज़िम्मेदार हैं कि उन्होंने अपने हमजोली चुनने में चूक की। मगर मैं मानता हूं कि बावजूद इसके उनके अलावा कोई और कांग्रेस का इसलिए उद्धार नहीं कर सकता है कि राहुल में अपने भीतर की यात्रा करने का जो जज़्बा है, वह कांग्रेसियों में दुर्लभ है।

इंद्रप्रस्थ की स्थापना के बाद महर्षि नारद ने युधिष्ठिर और अन्य भाइयों से प्रशासन संबंधी जो चर्चा की, उसका महत्व चिरंतन है। महाभारत के सभा-पर्व में इसका बहुत विस्तार से ज़िक्र है। नारद पूछते हैं, हे राजन! आपके चारों तरफ़ जो मित्र हैं, जो शत्रु हैं और जो न मित्र हैं, न शत्रु हैं; उन सबकी गतिविधियों पर आप नज़र रखते हैं या नहीं? क्या आप उसके अनुसार अपनी योजनाएं बनाते हैं? जो आपके मित्र हैं, क्या वे भरोसे के हैं? क्या आपके पास सही सलाह देने वाले मंत्री हैं? क्या उन सबका आपसे लगाव पक्का है? नारद ने पांडव-भाइयों से कहा कि राजा की विजय सही सलाह पर ही निर्भर है। महाभारत में कहा गया है कि वह सभा नहीं, जिसमें वृद्ध न हों। वृद्ध यानी बुड्ढे नहीं–तपे-तपाए लोग। और, वे वृद्ध नहीं, जो धर्म नहीं बताते। और, वह धर्म नहीं, जो सत्य नहीं। और, वह सत्य नहीं, जिसमें छल-कपट हो। राहुल को इन बीज-मंत्रों का ताबीज़ अपनी बांह पर धारण कर लेना चाहिए।

जब लोग आपको दोष दे रहे हों, आपको समझ नहीं पा रहे हों, ऐसे वक़्त में मुस्कराने के लिए आपको भीतरी ताक़त की ज़रूरत होती है। जब स्थितियां उस तरह की न हों, जैसी आप चाहते हैं तो अविचलित बने रहने के लिए आपको डटे रहने की क्षमता, शक्ति और साहस की जरूरत होती हे। गीता में कहा गया है ‘समत्वम् योग उच्यते’। यह सम-भाव ही किसी के भी जीवन की असली परीक्षा है। कस्तूरबा का अंतिम समय था। महात्मा गांधी की आंखों में आंसू थे। उन्होंने कहा कि आज मेरे सम-भाव का सबसे बड़ा इम्तहान है। मुझे याद है कि राहुल ने अपने विवाह के बारे में पूछे गए एक सवाल के जवाब में कहा था कि उनकी शादी तो कांग्रेस से हो चुकी है। सो, मरणासन्न पड़ी कांग्रेस के सिरहाने बैठे राहुल के सम-भाव का भी आज सबसे बड़ा इम्तहान है।

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