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व्यंग्य (खोज एक बड़ी सिद्धि वाले बाबा की) – Rashtriya Pyara
विशेष

व्यंग्य (खोज एक बड़ी सिद्धि वाले बाबा की)

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ग़ाज़ियाबाद: बरसों पहले मेरे एक मित्र थे। संगठन में अच्छे-अच्छे पदों पर आसीन रहकर उन्होंने काफी अच्छे कार्यों को अंजाम दिया था। उनके उन अच्छे कामों की बदौलत मुझे मेरा अस्तित्व संकट में नजर आने लगा और वे संगठन से निकल गए। वे संगठन से स्वयं निकले या निकाल दिए गए यह तो उन्हें या मुझे ही ठीक-ठीक पता है लेकिन उनके संगठन से निकलते ही मुझे अपना अस्तित्व निष्कंटक लगने लगा था। संगठन से निकले या निकाले गए लोगों के बारे में मुझे अच्छी तरह से पता था कि वे या तो पागल हो जाते है या आत्महत्या कर लेते हैं। वे भी दोनों में से कुछ ऐसा ही करेंगे ऐसा मेरा अनुमान था।

जैसा मैंने सोचा ऐसा ही हो इसके लिए मैंने अपने बूते के अनुसार सब कुछ किया लेकिन ईश्वर मेरे साथ नहीं था। हुआ बिल्कुल इसका उल्टा। वे पागल होने के स्थान पर और अधिक बुद्धिमान हो गए। स्वयं आत्महत्या करने की सोचने के स्थान पर ऐसा कुछ सोचने वाले लोगों को इससे उबारने का यत्न करने लगे।

पहले संगठन विशेष के कार्यक्रमों को ही आयोजित करवाते थे। अब वे सभी पार्टियों, संगठनों और सर्वसमाजों के सामाजिक और धार्मिक कार्यक्रमों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते। पहले वे संगठन विशेष के ही सिपाही कहलाते थे अब वे सभी समाजों के सिपाही के स्थान पर अगुआ कहलाने लगे उनको ऐसा करते देख मेरे कलेजे पर सांप लोट जाता।

समाचार पत्रों में अब वे नित्य छाये रहते हैं। लगता है अखबार के संपादकों और संवाददाताओं को भी उन्होंने अपनी और मिला लिया है। नगर के प्रमुख व्यक्तियों में अब वे शुमार होने लगे हैं। किसी भी कार्यक्रम को हड़पना अब कोई उनसे सीखे।

मैंने नगर के सभी संगठनों के लोगों को भी समझाने का प्रयास किया कि यह व्यक्ति आपके लायक नहीं है। इसको क्यों तुम लोग अपने संगठन में घुसा लेते हो। सामाजिक और धार्मिक कार्यक्रमों में क्यों इनको एन्ट्री देते हो। लेकिन उन पर इसका कोई फर्क पड़ता नजर नहीं आया अपितु वे कहते कि आप भी हमारे संगठन में घुस जाइए। आपको कौन रोकता है?

वे लोग यह नहीं समझते कि आखिर मैं ऐसा कैसा कर सकता हूं। मैं स्वयं एक संगठन विशेष का इतना बड़ा पदाधिकारी हूं। मेरे नाम से संगठन चलता है। कभी किसी के काम से भला कोई संगठन चला है?

उनको इस प्रकार काम करता देख मैंने इसकी खोजबीन करने के लिए एक खुफिया टीम का गठन भी किया है। जिसको यह पता करना था कि उनकी इतनी एनर्जी का राज क्या है? कहां से उनको इतनी शक्ति प्राप्त होती है। वे इतना सब कुछ होने के बाद भी आत्महत्या क्यों नहीं करते? क्यों लोग उनके बहकावे में आ जाते हैं। कोई एकॉनोमिक सोर्स नहीं होने के बावजूद भी वे इतने बड़े-बड़े कार्यक्रमों को कैसे कर लेते हैं। लोग क्यों उनके कार्यक्रमों के लिए अर्थ की कमी नहीं आने देते। उनकी सेहत पर अब तक कोई फर्क क्यों नहीं पड़ा। वे कौनसी चक्की का आटा खाते हैं जिससे वे अब तक पहले जैसे बने हुए हैं।

निष्कर्ष निकलकर आया कि उन्होंने एक बाबा से कुछ सिद्धियां प्राप्त कर रखी है। उन सिद्धियों की बदौलत ही वे अब तक जस के तस बने हुए है। चेहरे पर भी पहले जैसा तेज और वाणी में जोश है। लोगों को वश में करने का मंत्र भी उन्होंने उन बाबा से प्राप्त कर रखा है। इनकी सफलता और पागल नहीं होने व आत्महत्या नहीं करने का राज भी यही है।

लोग इसी सिद्धि की बदौलत आज तक इनके पूर्व संगठन में किए गए कार्यों को नही भूले हैं और बार-बार इन्हें उन्हीं पूर्व पदों के नाम से और काम से संबोधित करते हैं।

मेरे संगठन के बड़े-बड़े पदों पर आसीन व्यक्ति इन्हें आज तक उतनी ही तवज्जो और इज्जत देते हैं चाहे वे मंत्री हो या संतरी। इनकी इज्जत में कभी कोई कमी नहीं आने देते। इनके एक फोन पर तुरन्त काम करते हैं और उन फोनिक कामों की बदौलत ही इन्होंने अपना एक समूह खड़ा कर लिया है। मेरे संगठन के कुछ छुटभैये भी अपनी जिमेदारियों को पूरा करने के लिए इनका सहयोग लेने से नहीं हिचकिचाते।

मैं जानता हूं कि राजनीति में कोई किसी का स्थायी दोस्त और दुश्मन नहीं होता है। मेरे भी ये दोस्त थे। दिखावे को तो अब भी मेरे दोस्त हैं।

अवसर आने पर इनको यहां तक पहुंचाने में मैं अपनी भूमिका होने का गुणगान करने से पीछे नहीं हटता और वैसे भी हम कोई राजनीति तो खेल नहीं रहे। अपना अस्तित्व बचाने के लिए कौन प्रयास नहीं करता। जानवर भी करते हैं और मैं कोई जानवर से बदतर तो हूं नहीं।

पिछले दिनों वे अचानक एक कार्यक्रम में मिल गए। पीछे से मेरा कंधा छेड़ते हुए बोले, क्या हो रहा है आजकल- संगठन के काम बड़े मंदे चल रहे हैं, समाचार पत्रों में भी कहीं कुछ पढ़ने को नहीं मिल रहा है। सुना है संगठन से लोग इधर-उधर जा रहे हैं। पकड़ बड़ी ढीली हो गई लगती है आजकल आपकी।

उनकी कही गई बातें मुझे अंदर तक झकझोर गई। मेरी इच्छा हुई कि एक तमाचा कस कर जड दूं, लेकिन उनकी चीते सी फुर्तीली काया और अपना ढलता शरीर देख कर चुप रह गया। हालांकि बात तो सही थी लेकिन सही बात भी भला कही जाती है?

मैं उन्हें गौर से देखकर जवाब देता कि उससे पहले ही उन्होंने मेरी हथेली को अपने पंजों से दबा दिया। दबाते-दबाते ही बोले चलो कहीं बैठते हैं। जब तक मैं संभलता तब तक मेरा हाथ खींचा और कार्यक्रम से बाहर लगी चाय की स्टाल तक मुझे ले आए।

बड़ी मुश्किल से उनसे पीछा छुड़ाकर अपने ही कार्यक्रम से मैं भीगी बिल्ली की तरह दुम दबाकर अपने घर आया। इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी किसी तरह की कोई हिचकिचाहट नहीं, समूचे आत्मविश्वास से सरोबार। अब समझ में आ गया कि यह सब बाबा की सिद्धि का ही चमत्कार है। तुरंत शाम को अपनी खुफिया टीम की मीटिंग बुलाकर आदेश दे दिया कि कहीं से भी किसी बड़े बाबा का पता लगाओ जिसके पास बड़ी-बड़ी सिद्धि हो। गणेश जी की रिद्धि-सिद्धि से भी बढ़कर, जो उनकी सिद्धियों को भस्मीभूत कर, मेरा परचम लहरा सके।

-हनुमान मुक्त-

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