राजनीति

शिवराज का लोकसभा चुनाव लड़ने का मतलब…

शिवराज सिंह चौहान लोकसभा चुनाव लड़ेंगे या नहीं लड़ेंगे समय आ गया जब सस्पेंस से पर्दा हटाने वाला है.. चौहान ने अपनी ओर से सार्वजनिक तौर पर चुनाव लड़ने में भले ही अतिरिक्त दिलचस्पी नहीं दिखाई.. लेकिन राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की भूमिका में अपनी जिम्मेदारी का एहसास भी कराया.. जो हमेशा पार्टी लाइन को सर्वोपरि बताकर समय के अनुरूप राष्ट्रीय नेतृत्व की मंशा के अनुरूप खुद को ढाल अपनी उपयोगिता सिद्ध करते रहे.. शिवराज यदि लोकसभा चुनाव लड़े तो फिर इसके सियासी निहितार्थ निकाले जाना लाज़मी है.. तो निश्चित तौर पर नए सवाल भी खड़े होंगे.. चौहान यदि चुनाव नहीं लड़े और विधायक रहते राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की भूमिका में आगे बढ़ते हैं..
तो फिर इसमें भी नई संभावनाओं की आड़ में सियासी संदेश छुपे होंगे… शिवराज ने एक बार फिर दिल्ली पहुंचकर दोहराया कि टाइगर जिंदा है और उसका कार्य क्षेत्र मध्यप्रदेश तक सीमित है.. यही नहीं उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री और भोपाल से कांग्रेस उम्मीदवार दिग्विजय सिंह के खिलाफ अपनी संभावित उम्मीदवार को यह कहकर खारिज किया.. कि राजा को तो भाजपा का एक कार्यकर्ता ही हरा देगा.. ऐसे में जब शिवराज की दिलचस्पी मध्यप्रदेश की राजनीति तक खुद को सीमित रखने की नजर आ रही.. तब लोकसभा चुनाव लड़ने की अटकलों और कयासों पर जब विराम लगने वाला… ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि उम्मीदवारों की जिस अंतिम सूची का मध्यप्रदेश को इंतजार क्या उसमें शिवराज का नाम होगा या फिर नहीं..
मध्यप्रदेश के साथ राजस्थान-छत्तीसगढ़ में जहां पिछला विधानसभा चुनाव भाजपा हार चुकी.. वहां के पूर्व मुख्यमंत्रियों वसुंधरा राजे से लेकर रमन सिंह को लोकसभा का टिकट नहीं दिया गया.. राजस्थान में वसुंधरा के सांसद पुत्र को जरूर टिकट मिला.. लेकिन छत्तीसगढ़ में रमन सिंह और उनके पुत्र दोनों को दूर रखा गया.. विधानसभा चुनाव में हार के बावजूद शिवराज फैक्टर और उनका परफॉर्मेंस रमन सिंह और वसुंधरा के मुकाबले बेहतर आंका गया ..ऐसे में शिवराज को लोकसभा का चुनाव लड़ाए जाने की संभावना लगभग खत्म हो गई थी.. लेकिन भोपाल सीट से दिग्विजय सिंह को कांग्रेस द्वारा प्रत्याशी घोषित किए जाने के बाद उनके खिलाफ जब भाजपा के लिए जिताऊ उम्मीदवार की तलाश जरूरी हो गई..
उम्मीदवारी के चयन को लेकर मामला जब लंबा खिंच गया तब शिवराज एक बार फिर सुर्खियों में आ गए.. भोपाल से लेकर दिल्ली तक मीडिया द्वारा पूछे गए सवाल के जवाब में शिवराज ने अपने पत्ते नहीं खोले.. लेकिन संभावनाओं पर अपनी ओर से पूर्ण विराम भी नहीं लगाया.. ऐसे में जब दिग्विजय की सक्रियता लगातार बढ़ती जा रही.. तब भोपाल से भाजपा उम्मीदवार की ओर पूरे प्रदेश की नजर है.. प्रदेश से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर इस विशेष सीट पर कई दौर का चिंतन मंथन हो चुका है.. एक बार फिर शिवराज सिंह चौहान जब दिल्ली पहुंचे तो उम्मीद की जा रही है कि अब सस्पेंस खत्म होने वाला है.. शिवराज उस बुधनी विधानसभा सीट से विधायक है.. जहां से उन्होंने चुनावी राजनीति की शुरुआत की थी और बाद में संसदीय क्षेत्र विदिशा..
जिसमें बुधनी भी आता है, से कई लोकसभा चुनाव लड़कर जीत हासिल की थी.. 2003 में जरूर उमा भारती को भाजपा का चेहरा प्रोजेक्ट करते वक्त शिवराज को दिग्विजय सिंह के खिलाफ.. राघोगढ़ से चुनाव लड़ाया था.. जिसमें उनकी हार हुई थी.. फिलहाल उमा मध्य प्रदेश की राजनीति से दूर और लोकसभा चुनाव लड़ने से वह खुद इनकार कर चुकी है …लगभग 13 साल के मुख्यमंत्री रह चुके शिवराज के नेतृत्व में विधानसभा चुनाव में हुई हार के बाद भाजपा की अंदरूनी राजनीति में बदलाव देखने को मिला.. शिवराज को नेता प्रतिपक्ष से लेकर प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष बनाए जाने की अटकलों पर विराम लग चुका है..
तब उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई लेकिन दूसरे कई उपाध्यक्षों की तरह राष्ट्रीय स्तर पर किसी प्रदेश की जिम्मेदारी अभी तक उन्हें नहीं दी गई तो यही संदेश गया कि विधायक रहते कैलाश विजयवर्गीय जैसे राष्ट्रीय महासचिव की जिम्मेदारी निभा रहे थे.. उसी लाइन को शिवराज के विधायक रहते आगे बढ़ा है.. क्या क्योंकि गुजरात से विधायक रहते ही अमित शायद ही भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव बने थे.. तो ऐसे में जब कैलाश विजयवर्गीय पश्चिम बंगाल के प्रभारी है और पुत्र आकाश विजयवर्गीय विधायक बन चुके.. तब विधायक रहते शिवराज को लोकसभा चुनाव लड़ाए जाने के अपने मतलब होंगे..
यदि उन्हें चुनाव भोपाल सीट से दिग्विजय सिंह के खिलाफ लड़ाई जाता है तो मतलब साफ है कि भाजपा शिवराज को जीत की गारंटी मानती है.. यदि मकसद सिर्फ राष्ट्रीय राजनीति में ले जाना होता तो फिर उन्हें उनकी पुरानी परंपरागत विदिशा सीट से ही चुनाव लड़ाया जा सकता है.. जो उनके अपने विधानसभा क्षेत्र बुधनी का भी प्रतिनिधित्व करती.. यदि शिवराज भोपाल से चुनाव लड़े तो फिर दिग्विजय सिंह कड़े मुकाबले से इनकार नहीं किया जा सकता.. चर्चा यह भी जोर पकड़ती नहीं कि शिवराज के मुख्यमंत्री रहते संगठन सत्ता के सामने यदि नतमस्तक हो गया तो नया नेतृत्व उभर कर सामने नहीं आ पाया..
शिवराज के अलावा जिनका सियासी कद केंद्रीय राजनीति में पड़ा उनमें नरेंद्र सिंह तोमर कैलाश विजयवर्गी प्रमुख थे.. लेकिन नरोत्तम मिश्रा और गोपाल भार्गव ने भी अपनी अहमियत का एहसास कराया.. फिर भी यदि शिवराज की उस बात पर यकीन करें कि कोई कार्यकर्ता ही दिग्विजय सिंह को हरा देगा.. बात बेमानी साबित होगी.. यदि शिवराज को चुनाव लड़ा है कि आप तो ..आखिर क्या वजह है जो एक साधारण कार्यकर्ता की जगह तीन बार के मुख्यमंत्री और कई लोकसभा चुनाव जीत चुके.. शिवराज को अंततोगत्वा लंबे इंतजार के बाद दिग्गी राजा के खिलाफ खड़ा कर दिया गया..
क्या कांग्रेस की सरकार रहते दिग्विजय सिंह की उम्मीदवारी को भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व के साथ.. संघ ने गंभीरता से लिया है.. जो कोई जोखिम लेने को तैयार नहीं शिवराज की इमेज भाजपा में रहते.. सेकुलर मुख्यमंत्री के तौर पर पहले ही बन चुकी थी.. जबकि दिग्विजय की गिनती संघ को सीधे निशाने पर लेने वाले कांग्रेस नेता के तौर पर होती है.. लेकिन बात आज शिवराज की तो कयासबाजी के बीच यदि इस चुनाव में जीत और हार की तो संदेश साफ है कि दिग्विजय सिंह के खिलाफ उनकी यह जीत.. उन्हें यदि राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा के तीसरे बड़े नेता के तौर पर स्थापित कर देगी..
तो प्रदेश की राजनीति से उनकी दूरी बढ़ना भी सुनिश्चित हो जाएगी.. भले ही उन्होंने हमेशा यही कहा कि टाइगर जिंदा है और मध्य प्रदेश से दूर जाने का कोई सवाल ही खड़ा नहीं होता.. सवाल यह भी है कि पीढ़ी परिवर्तन के दौर में जब भाजपा में मार्गदर्शक मंडल का अस्तित्व ही खत्म हो गया और अटल-आडवाणी-जोशी के दौर में स्थापित और आगे बड़े नेता दूर-दूर तक लोकसभा में नजर नहीं आएंगे.. तब शिवराज की लोकसभा में मौजूदगी को नरेंद्र मोदी और अमित शाह आखिर किस तरह लेंगे..
वह भी तब जब भाजपा को अमित शाह के विकल्प के तौर पर संवैधानिक मान्यता के अंतर्गत एक नए राष्ट्रीय अध्यक्ष की तलाश होगी.. इस जीत के साथ ही शिवराज का प्रदेश भाजपा की राजनीति में हस्तक्षेप भले ही बना रहे.. लेकिन यह भी तय है कि नया नेतृत्व सामने लाया जाएगा.. इसके लिए स्वीकार्यता बनाना भी जरूरी ही होगा.. राकेश सिंह सांसद रहते प्रदेश भाजपा अध्यक्ष की जिम्मेदारी जरूर निभा रहे हैं.. लेकिन एक बार फिर उनकी जीत उन्हें केंद्रीय भूमिका की ओर आगे ले जा सकती है..
ऐसे में जब कुछ समय पहले ही नेता प्रतिपक्ष के दौर पर ब्राह्मण गोपाल भार्गव को नई जिम्मेदारी दी जा चुकी है और अभी तक उनके पुत्र को लोकसभा का टिकट नहीं मिला है.. तो फिर शिवराज के दिल्ली की ओर बढ़ते कदम के साथ राकेश सिंह के विकल्प की तलाश तेज होगी तो सवाल क्या इस जिम्मेदारी को निभाने के लिए राष्ट्रीय नेतृत्व किस पर भरोसा करेगा.. क्या पूर्व संसदीय मंत्री पंडित नरोत्तम मिश्रा जो पहले भी अध्यक्ष बनते बनते रह गए या फिर इंतजार किया जाएगा.. राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय प्रदेश की राजनीति में लौटने का जो फिलहाल पश्चिम बंगाल में बड़ी जिम्मेदारी निभा रहे हैं..
तो शिवराज का लोकसभा चुनाव लड़ना और जीतने के साथ ही डेढ़ दशक बाद भाजपा के मध्यप्रदेश में एक नए युग में प्रवेश करने से इनकार नहीं किया जा सकता.. इन सब अटकलों पर मोहर तभी लग सकती है जब केंद्र में एक बार फिर नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने और भाजपा सत्ता में लौटे.. वरना बदलती परिस्थितियों में फिर बड़े बदलाव से इनकार नहीं किया जा सकता और इससे राष्ट्रीय ही नहीं प्रदेश की राजनीति भी बदले बिना नहीं रह सकती.. लेकिन सवाल फिर शिवराज के लोकसभा चुनाव लड़ने के साथ इस जीत के साथ खड़े होते हैं जिसके साथ ही बुधनी विधानसभा सीट खाली हो जाएगी..
तो बड़ा सवाल विदिशा से लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा गया और दिग्विजय सिंह के खिलाफ कठिन चुनौती को ध्यान में रखते हुए शिवराज पर अंतिम दांव लगाया गया तो क्या गारंटी है.. लोकसभा सांसद बनने के बाद बुधनी विधानसभा सीट उनके परिवार के खाते में ही जाएगी.. जहां उनकी धर्मपत्नी और पुत्र लगातार अपनी सक्रियता बनाए हुए.. लाख टके का सवाल अपनी परंपरागत लोकसभा सीट विदिशा जो उन्होंने कभी अटल बिहारी वाजपेयी से उनके इस्तीफे के साथ हासिल की थी और बाद में सुषमा स्वराज को सौंप दी थी.. क्या आसानी से किसी और के सुपुर्द होने देंगे जब सुषमा स्वराज लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ रही..
ऐसे में यदि शिवराज फिर लोकसभा चुनाव जीतकर सांसद बने तो क्या गारंटी है कि उनकी बुधनी विधानसभा सीट पर उप चुनाव में उम्मीदवार उनके अपने परिवार से ही होगा.. क्योंकि भाजपा ने वंशवाद और 75 साल के क्राइटेरिया की आड़ में कई टिकट काटे हैं तो सवाल क्या शिवराज की पसंद जीत की गारंटी लेने के साथ दिग्विजय सिंह के खिलाफ किसी नए चेहरे के साथ सामने आएगी ..तो क्या शिवराज का प्रदेश की राजनीति में आगे भी सक्रिय बने रहने का रास्ता साफ हो जाएगा.. अभी तक प्रदेश भाजपा की राजनीति में हस्तक्षेप रखने वाले गिने चुने नेताओं में नरेंद्र सिंह केंद्रीय मंत्री रहते मुरैना से चुनाव लड़ रहे हैं.. तो प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह भी मैदान में है ..लेकिन राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय उपाध्यक्ष प्रभात झा को पार्टी ने लोकसभा के लिए उम्मीदवार घोषित नहीं किया..

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *