राजनीति

सरकार ने अपना विधानसभा अध्यक्ष बनाया तो विपक्ष ने अपनी भूमिका का माहौल

देवदत्त दुबे जैसे की संभावना थी विधानसभा का शीतकालीन सत्र जब शुरू हुआ तो विधानसभा अध्यक्ष के चुनाव को लेकर काफी गहमागहमी रही, परंपरा टूटी और अध्यक्ष के लिए सत्ता और विपक्ष की ओर से नामांकन पत्र दाखिल किए थे लेकिन मंगलवार को विपक्षी उम्मीदवार विजय शाह की उम्मीदवारी का प्रस्ताव ना पढ़ कर सरकार ने विपक्षी दल को विपक्षी दल को मौका दे दिया। इसी अवसर का लाभ लेकर सरकार ने अपना अध्यक्ष निर्वाचित करा लिया। मंगलवार को सदन की कार्रवाई शुरू होते ही जैसे ही प्रस्ताव पढ़े गए तो उसमें सत्ता पक्ष की ओर से एनपी प्रजापति को विधानसभा अध्यक्ष बनाए जाने का प्रस्ताव पेश किया गया।
इसके बाद जैसे ही नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव भाजपा प्रत्याशी विजय शाह का प्रस्ताव पेश करने खड़े हुए तब संसदीय कार्य मंत्री गोविंद सिंह ने आपत्ति ली कि जो प्रस्ताव पहले आ चुका है वही मान्य होगा और इसी के साथ सदन में हंगामा शुरू हो गया। प्रोटेम स्पीकर ने सदन की कार्रवाई स्थगित की और दोबारा कार्यवाही शुरू होते ही ध्वनि मत के आधार पर एनपी प्रजापति को स्पीकर घोषित कर दिया। सत्ता पक्ष की ओर से डॉक्टर गोविंद सिंह, आरिफ अकील, बीएसपी से बैजनाथ कुशवाहा, पीसी शर्मा और ग्यारसी लाल रावत ने एनपी प्रजापति के नाम का प्रस्ताव पेश किया था लेकिन नेता प्रतिपक्ष के प्रस्ताव को मान्य नहीं किया गया।
दोनों ही दलों की ओर से आज की सदन की कार्यवाही को लेकर जोरदार तैयारियां थी। सत्ताधारी दल जहां हर हाल में विधानसभा अध्यक्ष अपने दल का जिताने के लिए संकल्पित था वहीं विपक्षी दल भाजपा ने भी अपने सभी विधायकों को विधानसभा में बुलाया था लेकिन जैसे ही हंगामा शुरू हुआ भाजपा सदस्यों ने विधानसभा का बायकाट कर दिया और राजभवन की ओर पैदल मार्च करते हुए निकल गए।
पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने जहां इसे लोकतंत्र की हत्या बताया वहीं कांग्रेस ने भाजपा पर विधायकों की खरीद फरोख्त के आरोप लगाए। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने तो बाकायदा नाम लेकर पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा और विश्वास सारंग पर कांग्रेसी विधायकों को 50 से लेकर 100 करोड़ तक में खरीदने की बात कही। बैजनाथ कुशवाहा विधायक के बयान भी मीडिया में आए जिसमें उन्होंने भाजपा नेताओं द्वारा संपर्क किए जाने की बात कही।
इसके पहले भाजपा ने बहिर्गमन करके विधानसभा से राजभवन तक पैदल मार्च किया और राज्यपाल आनंदी बेन पटेल को ज्ञापन सौंपा। इस बीच कांग्रेस सरकार ने सदन के अंदर विधायक की मांग पर मत विभाजन करा दिया जिसमें एनपी प्रजापति को 120 सदस्यों का समर्थन हासिल हो गया। कुल मिलाकर दोनों ही दलों में अनुभवी नेताओं ने अपने-अपने तरीके से ऐसी चालें चली जिसमें दोनों ही अपने आप को जीता हुआ मान रहे।
सत्ताधारी दल ने जहां बहुमत से अध्यक्ष निर्वाचित करवा लिया वहीं विपक्षी दल भाजपा ने पहले ही दिन हंगामा करके वर्क आउट करके दिखा दिया कि विपक्षी दल के रूप में उसमें दमखम बहुत है और सदन की कार्रवाई अब आगे किस प्रकार चलेगी इसको लेकर भी संशय बना हुआ है। कांग्रेस अब भाजपा को कोई मौका नहीं देना चाह रही है। जैसा कि भाजपा सरकार के रहते कांग्रेसियों के साथ व्यवहार सदन के अंदर हुआ करता था।
दूसरी तरफ कांग्रेस की बजाए भाजपा विपक्ष के रूप में मजबूत स्थिति में है इसलिए वह कांग्रेस को आगे मनमानी करने के मौके शायद ही दे पाए। इस कारण शीतकालीन सत्र हंगामेदार, गरमा गरम होने की आसार शुरुआत से ही बन गए हैं। बुधवार को सदन में दोनों दलों की क्या रणनीति होगी इसको लेकर देर रात तक दोनों दलों के नेता बैठकें करते रहे।

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