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सलाहकारों पर क्या ठीकरा फोड़ना? – Rashtriya Pyara
राजनीति

सलाहकारों पर क्या ठीकरा फोड़ना?

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लोकसभा के चुनाव नतीजों के बाद जिसे देखिए वह राहुल गांधी के सलाहकारों और उनकी टीम पर ठीकरा फोड़ने में लगा है। ऐसा लग रहा है, जैसे राहुल की खुद कोई गलती नहीं है या उनकी कोई जवाबदेही नहीं है। उन्होंने तो मेहनत कर दी, सभाएं कर दीं, ट्विट कर दिए, मोदी पर हमला कर दिया, चौकीदार चोर हैं के नारे लगवा दिए और उनकी जिम्मेदारी पूरी हो गई! ऐसा नहीं है। उन्हें नेता बनाया गया है। उनको देश के 135 करोड़ लोगों का नेतृत्व करने की सोच के साथ राजनीति के लिए तैयार किया गया है। वे 15 साल से सांसद हैं और इस दफा चौथी बार लोकसभा के लिए चुने गए हैं।

वे राजनीति में आने के साथ ही देश की सबसे पुरानी पार्टी के महासचिव बने, फिर उपाध्यक्ष बने और अब अध्यक्ष बने हैं। ऐसी सुविधा कांग्रेस में किस नेता को मिली है? कांग्रेस संगठन के सारे अहम पद को सुशोभित करने और चार बार सांसद बनने के बावजूद अगर वे खुद कुछ करने की स्थिति में नहीं हैं तो फिर क्यों उनको नेता बने रहना चाहिए? अगर उनके सलाहकारों ने उनको फेल किया या कांग्रेस के पुराने नेताओं ने उनको सफल नहीं होने दिया तो ऐसा नरेंद्र मोदी और अमित शाह के साथ उनके सलाहकार और उनकी पार्टी के पुराने नेता क्यों नहीं कर पाए?

जवाब बहुत सीधा है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह अपनी समझदारी और अपने अनुभव से राजनीति करते हैं। उन्होंने इस कहावत की गांठ बांधी है कि – सुनो सबकी, करो अपने मन की। राजा या नेता सबकी सुनता है। सबसे फीडबैक लेता है। पर करता वहीं है, जो उसको सही लगता है, जो उसकी समझ से सही है। और उसकी समझ कुछ तो उसके अनुभव से बनती है, कुछ अपनी प्रेरणा से बनती है, कुछ परवरिश का नतीजा होता है और कुछ ईश्वर प्रदत्त गुणों से बनती है।

सिर्फ पद देने से नेतृत्व या राजनीति की समझ नहीं बन सकती है। अगर 15 साल में सारे पद पर रह कर राहुल गांधी अपने दम पर और अपने हिसाब से पार्टी चलाने में सक्षम नहीं हैं तो उनको निश्चित रूप से पार्टी से और हो सके तो राजनीति से भी अलग हो जाना चाहिए। अगर वे भाजपा या लेफ्ट जैसी किसी पार्टी के नेता होते तो अभी वे जैसा कर रहे हैं, उसके बाद उनके लिए पार्टी में जगह नहीं रह जाती।

खुद राहुल को और उनको मनाने में लगे कांग्रेस नेताओं को इतिहास से कुछ सबक लेना चाहिए। मुगल बादशाह अकबर 13 साल की उम्र में 1556 ईस्वी में भारत की गद्दी पर बैठा था। तब सरकार चलाने में बैरम खां उनकी मदद करते थे। पर पांच साल बाद 1561 में अकबर ने अपने सबसे ताकतवर सलाहकार बैरम खां को हज पर रवाना कर दिया और दिल्ली से बाहर निकलते ही उनकी हत्या हो गई। ज्यादातर इतिहासकार इस बात पर सहमत हैं कि अकबर ने ही बैरम खां को मरवा डाला।

इसके बाद पांच साल के प्रशिक्षण के दम पर 18 साल की उम्र में अकबर ने कामकाज संभाला और 1605 ईस्वी में जब आखिरी सांस ली तब तक इस मुल्क के शहंशाह बने रहे। अकबर महान कहलाए। उनका प्रशिक्षण सिर्फ पांच साल का था और जब अपने दम पर गद्दी संभाली तक उम्र सिर्फ 18 साल की थी। राहुल गांधी 33 साल की उम्र में राजनीति में उतरे और 15 साल के जबरदस्त प्रशिक्षण और अनुभव के बाद अब भी सलाहकारों पर ही निर्भर हैं और चुनाव हारने के बाद रूठ कर कोपभवन में बैठे हैं! इससे बड़ा मजाक क्या हो सकता है? यह कोई उनके परिवार का मामला नहीं है, बल्कि राजनीति है, जो इंसान द्वारा ईजाद किया गया सबसे बर्बर और क्रूर खेल है!

अगर कांग्रेस के नेता अकबर की मिसाल से नहीं समझ सकते हैं तो नरेंद्र मोदी और अमित शाह की मिसाल से समझें। क्या कांग्रेस का कोई नेता बता सकता है कि नरेंद्र मोदी गुजरात से दिल्ली के लिए चले थे तो उनके साथ कौन से सलाहकार थे? गुजरात में रहते दिल्ली आने की तैयारी कर रहे नरेंद्र मोदी के पास अरुण शौरी, राम जेठमलानी, सुब्रह्मण्यम स्वामी और यशवंत सिन्हा जैसे सलाहकार थे। उनके दिल्ली आते आते ये सारे लोग हाशिए में चले गए।

ऐसे ही अमित शाह की टीम में कौन है, जिसका बड़ा राजनीतिक अनुभव रहा है और जिसके कहने से वे काम करते हैं? कोई नहीं है! पांच-सात साल पहले दिल्ली की राजनीति में भूपेंद्र यादव, कैलाश विजयवर्गीय, राम माधव, अनिल जैन जैसे नेताओं को जानने वालों की संख्या गिनी चुनी थी। लेकिन इन नेताओं से अमित शाह ने ऐसे ऐसे काम कराए, जो कांग्रेस का कोई धुरंधर नहीं कर सकता है। कांग्रेस से लाकर हिमंता बिस्वा सरमा से और तृणमूल कांग्रेस से लाकर मुकुल रॉय से अमित शाह ने जो काम कराए क्या वैसा काम कांग्रेस का कोई नेता करा सकता है? नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने पत्थर छूकर पारस बना दिया। क्या राहुल गांधी ऐसा कर सकते हैं?

राहुल की राजनीति का असली समय वह था, जब उन्होंने जगन मोहन रेड्डी को आंध्र प्रदेश की सत्ता सौंपने से मना किया था या जब उन्होंने दागी सांसदों को बचाने वाले अध्यादेश की कॉपी फाड़ी थी। अगर वे उस समय अपनी सोच पर अड़े रहते और तय कराते कि उनकी पार्टी वंशवाद की राजनीति को आगे नहीं बढ़ाएगी या दागियों के दम पर राजनीति नहीं करेगी तो नरेंद्र मोदी और अमित शाह के लिए दिल्ली की राजनीति में अवसर नहीं बनते। ध्यान रहे वंशवाद और भ्रष्टाचार ये दो ही मुद्दें हैं, जिन पर पिछले छह साल से मोदी और शाह कांग्रेस और गांधी-नेहरू परिवार व उनके सहयोगियों की धुलाई कर रहे हैं।

पर अफसोस की बात है कि राहुल गांधी अपने उस थिएटरिकल को आगे नहीं बढ़ा सके वे नए तरह की राजनीति करने में विफल रहे। वे युवा भारत की आकांक्षाओं को समझ नहीं पाए। इसलिए विफलता उनकी है। ध्यान रहे विफलता कभी सलाहकारों की नहीं होती है क्योंकि आज जो एक नेता का सलाहकार है वह कल दूसरे नेता का सलाहकार हो सकता है। असली विफलता नेतृत्व की होती है। यह भी ध्यान रखना होगा कि सलाहकार नेता के लिए होते हैं, नेता सलाहकारों के लिए नहीं होता है। अगर कोई सलाहकार ठीक से काम नहीं कर रहा है तो नेता उसे हटाए और दूसरे को आजमाए। अगर नेता इतना भी नहीं कर सकता है तो उसे क्यों नेता बने रहना चाहिए?

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