दिल्ली

स्कूली बच्चों के बस्ते का बोझ कम करने के आदेश पर रोक से इनकार

नई दिल्ली | स्कूली बच्चों के बस्ते का बोझ कम करने के दिल्ली सरकार के आदेश पर हाईकोर्ट ने बुधवार को अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया। साथ ही, सवाल किया कि क्या शैक्षिक प्रकाशकों के पास सरकार के इस आदेश को चुनौती देने के न्यायिक अधिकार हैं?’ दरअसल, प्रकाशनों के संगठन ने आदेश के विरोध में याचिका दी है।
जस्टिस सी. हरि. शंकर ने कहा कि फिलहाल हम सरकार के आदेश पर रोक नहीं लगा सकते। उन्होंने दि फेडरेशन ऑफ एजूकेशनल पब्लिशर्स की याचिका पर यह आदेश दिया। याचिका में स्कूली बच्चों के बस्ते का बोझ कम करने के लिए शिक्षा निदेशालय के 29 नवंबर के आदेश को चुनौती दी गई है। सरकार के आदेश को मनमाना बताते हुए इसे रद्द करने की मांग की गई है। हालांकि, हाईकोर्ट ने शिक्षा निदेशालय को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। हाईकोर्ट ने स्कूलों को बच्चों के पाठ्यक्रम व होमवर्क इस हिसाब से तय करने को कहा, ताकि बस्ते का वजन निर्धारित वजन से ज्यादा न हो।
प्रकाशकों ने कोर्ट के समक्ष ये दलील दीं
याचिकाकर्ता संगठन ने कहा कि सरकार के आदेश से उनके कारोबारी अधिकारों का हनन होगा। बस्ते का बोझ कम करने के बहाने स्कूलों में सिर्फ एनसीईआरटी-एससीईआरटी द्वारा प्रकाशित पुस्तकें हीं चलेंगी। याचिका में स्कूलों के भीतर वाणिज्यिक गतिविधियों से जुड़े मसले पर हाईकोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए सरकार के आदेश को रद्द करने और मामला लंबित रहने तक इस पर रोक लगाने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया कि सरकार ने यह आदेश बिना किसी सर्वे या आंकड़ों के जारी किया है। इससे बच्चे अपनी पसंद के प्रकाशकों की किताब पढ़ने के अधिकार से वंचित रह जाएंगे।
यह था मामला
शिक्षा निदेशालय ने 29 नवंबर को राजधानी के सभी निजी स्कूलों में छात्रों के बस्ते का बोझ कम करने का आदेश दिया। छात्रों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले कुप्रभावों को देखते हुए यह आदेश जारी किया गया।
सरकार ने यह पक्ष रखा
इससे पहले, सरकार की ओर से अधिवक्ता संतोष त्रिपाठी ने दि फेडरेशन ऑफ एजूकेशनल पब्लिशर्स की याचिका का कड़ा विरोध किया। त्रिपाठी ने हाईकोर्ट के सामने सवाल उठाया कि ‘क्या अब स्कूलों में बच्चों का पाठ्यक्रम प्रकाशक-वेंडर तय करेंगे?।’ पाठ्यक्रम तय करना सरकार का काम है। इसे कोई प्रकाशक तय नहीं कर सकता है।

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