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72 घंटे में क्या मिल जाएगा नया प्रदेश अध्यक्ष..? – Rashtriya Pyara
राजनीति

72 घंटे में क्या मिल जाएगा नया प्रदेश अध्यक्ष..?

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राहुल गांधी के दर्द के साथ सामने आई अपेक्षाओं को पूरी करने के लिए संगठन से जुड़े 100 से अधिक पदाधिकारियों के इस्तीफा दिए जाने की खबर सामने आ चुकी है.. जिसमें मध्य प्रदेश से विवेक तंखा के बाद बड़ा नाम राष्ट्रीय महासचिव और प्रदेश के प्रभारी दीपक बावरिया का भी शामिल हो चुका है.. कमलनाथ भी इस्तीफे की पेशकश की बात सामने ला चुके हैं.. जो सिर्फ प्रदेश अध्यक्ष नहीं.. बल्कि मुख्यमंत्री भी है.. तो अब जब कमलनाथ एक और दौरे पर दिल्ली जा रहे हैं.. तो सवाल खड़ा होना लाजमी है कि इस बार क्या राहुल गांधी से उनकी सीधे वन टू वन मुलाकात होगी..
क्योंकि प्रदेश प्रभारी दीपक बावरिया इस्तीफा दे चुके तो उनकी मध्य प्रदेश को लेकर आखिर अब आगे भूमिका क्या होगी.. क्योंकि राहुल गांधी के हवाले से ही छत्तीसगढ़ के नए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की नियुक्ति का संदेश भी लिखित तौर पर सामने आ चुका है.. जो पहले ही राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद से इस्तीफा दे चुके हैं.. तो क्या यह मान लिया जाए कि राहुल गांधी और फैसले लेने लगे लगातार उनकी पार्टी नेताओं से विचार-विमर्श का दौर भी आगे बढ़ चुका है.. यदि दीपक बावरिया खुद को मध्य प्रदेश की जिम्मेदारियों से मुक्त कर चुके तो ऐसे में क्या अब लंबे समय से चलती आ रही कमलनाथ की मुलाकात के दौरान क्या राहुल गांधी अगले 72 घंटे में मध्य प्रदेश को नया प्रदेश अध्यक्ष दे सकते हैं.. यानी कमलनाथ के दिल्ली से लौटने के साथ ही मध्य प्रदेश कांग्रेस के संगठन में बदलाव का सस्पेंस खत्म हो जाएगा या फिर अनुभवी और पुरानी पीढ़ी के मुख्यमंत्री कमलनाथ की भी राहुल गांधी से कुछ अपेक्षाएं होंगी.. जिनके पूरे होने के बाद ही मध्य प्रदेश की नई स्कि्रप्ट सामने आएगी..

अनुभवी कमलनाथ और युवा राहुल गांधी की एक-दूसरे से अपेक्षाएं आखिर क्या? राहुल गांधी के दर्द सामने आने के बाद मुख्यमंत्री कमलनाथ का रिएक्शन सामने आया और अगले 24 घंटे के अंदर पहले विवेक तंखा और फिर दीपक बाबरिया के इस्तीफे भी सामने आ गए.. कमलनाथ ने शुक्रवार को बल्लभ भवन जाने की बजाए ज्यादा समय अपने आवास पर गुजारा.. तो कैबिनेट के कई सहयोगी मंत्रियों से भी उनकी मुलाकात हुई.. इनमें से कई मंत्रियों ने बाहर आकर नैतिकता का हवाला देकर कमलनाथ के फैसले के साथ खुद को खड़ा बताया.. तो संदेश यही गया कि कमलनाथ के दिल्ली दौरे के दौरान राहुल गांधी से उनकी मुलाकात महत्वपूर्ण साबित होने वाली है और मध्य प्रदेश के मंत्री कमलनाथ के पीछे एकजुट है..

यह संदेश दिल्ली तक जाना चाहिए.. क्योंकि मुलाकात करने वालों में सिंधिया गुट के भी मंत्री शामिल थे.. लेकिन इस दौरान ही राहुल गांधी के हवाले से छत्तीसगढ़ प्रदेश अध्यक्ष मोहन मरकाम की नियुक्ति में भी छुपे कुछ संदेश सामने आए.. बड़ा संदेश जो सवाल खड़ा करता है कि क्या इस्तीफे पर अड़े राहुल गांधी संगठन के फैसले लेने लगे हैं और छत्तीसगढ़ की नियुक्ति को आखिर क्या माना जाए … मध्य प्रदेश के साथ राजस्थान को लेकर भी फैसले रुके हुए.. तो क्या कांग्रेस के अंदर प्रेशर पॉलिटिक्स पुरानी और नई पीढ़ी के बीच देखने को मिल रही है.. मुख्यमंत्री कमलनाथ के दिल्ली दौरे की खबर सामने आई.. जो 29 जून को इंदौर होते हुए रात को दिल्ली पहुंचेंगे और 2 जुलाई को वापस भोपाल लौटेंगे..

तो सवाल दिल्ली में बदलते राजनीतिक परिदृश्य और कांग्रेस के अंदर जारी बैठकों के दौर के बीच सवाल यह खड़ा हो चुका है.. क्या कमलनाथ और राहुल गांधी के बीच मुलाकात फिक्स हो चुकी है.. जिसे कम से कम अधिकृत तौर पर बाहर नहीं लाया जा रहा.. यह पहला मौका होगा जब लोकसभा चुनाव हारने के बाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष मुलाकात होगी.. इस मुलाकात में प्रदेश प्रभारी दीपक बावरिया का रोल क्या होगा.. इसको लेकर भी सस्पेंस बढ़ गया है.. इस्तीफा स्वीकार नहीं किए जाने तक बाबरिया भी अपनी पुरानी भूमिका में नजर आ सकते हैं..

सवाल यहीं पर खड़ा होता है कि आखिर राहुल गांधी की कमलनाथ से कुछ अपेक्षाएं होंगी तो शायद पूरी नहीं हुई.. तो अब नई अपेक्षाएं भी सामने आ सकती हैं.. लेकिन सरकार के 6 माह पूरे कर चुके कमलनाथ की भी राष्ट्रीय नेतृत्व से कोई अपेक्षा जरूर रहेगी.. राहुल गांधी अभी युवा पीढ़ी को सामने लाने की बात कर रहे हैं तो इसे कमलनाथ को समझना होगा.. क्योंकि ‘यह वक्त है बदलाव का’ नारा देने वाली कांग्रेस के अंदर पीढ़ी परिवर्तन का छत्तीसगढ़ को एक आदिवासी प्रदेश अध्यक्ष दिए जाने के बाद सवाल यह खड़ा हो चुका है कि मध्यप्रदेश को नया प्रदेश अध्यक्ष क्या एक आदिवासी ही मिलेगा या फिर पिछड़े दलित और महिला वर्ग को भी लेकर दूरगामी रणनीति के तहत चिंतन-मंथन किया जा सकता है..

क्या राहुल गांधी ने किसी व्यक्ति विशेष को लेकर मन बना लिया है.. तो कमलनाथ मुख्यमंत्री रहते उस पर अपनी सहमति किस तरह दर्ज कराते हैं.. यदि छत्तीसगढ़ के फैसले से जोड़ा जाए तो मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से मुलाकात के बाद नए प्रदेश अध्यक्ष का नाम विधायक रहते मोहन मरकाम के रूप में सामने आया.. जो राहुल गांधी से मुलाकात पहले ही कर चुके.. तो सवाल क्या जब विधानसभा से लेकर लोकसभा चुनाव में कई जाने पहचाने अनुभवी दिग्गज नेता चुनाव हार चुके हैं.. तो प्रदेश संगठन की कमान आखिर किसे दी जाएगी.. क्या वह सिर्फ विधायक होगा या फिर जिसको चुनाव लड़ने का मौका नहीं मिला या फिर कमलनाथ कैबिनेट का हिस्सा बन चुके किसी एक विधायक को संगठन में भेजा जाए.. पिछले 6 माह में कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद पार्टी के अंदर गुटबाजी बढ़ी है और अलग-अलग खेमे नजर आने लगे हैं..

जिन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनने के साथ कमलनाथ ने काफी हद तक करने में सफलता हासिल की थी.. सवाल राहुल गांधी ने मंदसौर दौरे के दौरान कमलनाथ को अनुभवी और ज्योतिरादित्य के पास अभी समय होने का हवाला देकर कमलनाथ की लाइन मुख्यमंत्री के तौर पर आगे बढ़ा दी थी.. उसके बाद सीएम इन वेटिंग सिंधिया का दावा बहुत दूर जा चुका था.. लेकिन लोकसभा चुनाव हारने के बाद ज्योतिरादित्य के समर्थक मंत्री और विधायक कमलनाथ सरकार के लिए परेशानी का सबब बन चुके हैं.. तो राहुल गांधी ने कमलनाथ की जोड़ी ज्योतिरादित्य से भले ही विधानसभा चुनाव से पहले बनाई थी.. लेकिन सरकार में आने के बाद यह जोड़ी न सिर्फ टूट गई.. बल्कि कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की जोड़ी मजबूत होकर उभरी है..

तो पीढ़ी बदलाव के इस दौर में राहुल गांधी की मध्य प्रदेश में कांग्रेस की दिशा को लेकर मुख्यमंत्री कमलनाथ से अपेक्षाएं लाजमी हैं.. जिनकी सीधी मुलाकात ना होने के कारण तरह-तरह की चर्चाएं जोर पकड़ती रहीं.. तो बड़ा सवाल क्या कमलनाथ की राहुल गांधी से मुलाकात के बात कांग्रेस को नया प्रदेश अध्यक्ष मिल जाएगा तो फिर वह चेहरा कौन होगा.. क्या कमलनाथ की पसंद को ही राहुल गांधी द्वारा नवाजा जाएगा या फिर अगले विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए संगठन के कायाकल्प के लिए किसी नौजवान चेहरे को सामने लाया जाएगा.. तो यह राहुल की व्यक्तिगत पसंद होगी या फिर कमलनाथ और ज्योतिरादित्य के बीच की पसंद के तौर पर नया नाम सामने आएगा या फिर कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की एकजुटता सिर्फ ज्योतिरादित्य नहीं..
राहुल गांधी पर भारी साबित होगी.. फैसला आसान नहीं चिंता नई पीढ़ी युवा चेहरे को सामने लाने की तो क्षेत्रीय समीकरण के साथ जाति धर्म वर्ग समुदाय के बीच बीच संतुलन बनाना है.. लाख टके का सवाल राहुल गांधी की मध्य प्रदेश और यहां के मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ से जो भी अपेक्षाएं हैं…. उनका नाता कांग्रेस की बेहतरी से ही होगा.. लेकिन 6 माह पहले कांग्रेस में जो एकता जुनून नजर आ रहा था यदि सत्ता में आने के बाद उसकी जगह गुटबाजी ने ले ली है ..तो राहुल गांधी किस फार्मूले के तहत मध्यप्रदेश में समन्वय सामंजस्य की सियासत को कांग्रेस में एक नई दिशा देंगे.. यदि कमलनाथ ने लोकसभा चुनाव में मिली हार की जिम्मेदारी स्वीकार कर ली है तो फिर नैतिकता की इस पहल पर कांग्रेस की नीति और नियत क्या होगी.. क्या एक बार फिर कमलनाथ और ज्योतिरादित्य की एकजुटता देखने को मिलेगी या फिर यह बात और अपेक्षा अब गुजरे जमाने की बात हो गई है..

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