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दो बिल्कुल अलग अलग छोर की घटनाओं ने एक बार फिर असहिष्णुता बढ़ने या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कम किए जाने की बहस को केंद्र में ला दिया है। दोनों छोर की दो-दो घटनाओं की मिसाल दी जा सकती है। इनमें एक छोर राजनीति का है। पश्चिम बंगाल में राज्य सरकार ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री […]Continue Reading
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देश का नंबर एक राजनीतिक विवाद बने राफेल विमान सौदे की सीएजी रिपोर्ट संसद में पेश हो गई है। संसद के बजट सत्र और 16वीं लोकसभा के आखिरी सत्र के आखिरी दिन सरकार ने नियंत्रक व महालेखापरीक्षक यानी सीएजी की रिपोर्ट संसद के पटल पर रखी। कायदे से इस रिपोर्ट से राफेल सौदे का पूरा […]Continue Reading
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एक मित्र, जिन्हें विदेशी समाजों का भी गहरा लंबा अनुभव है, लिखते हैं, ‘‘बीजेपी की प्रशासनिक नाकामी और आरएसएस की महत्वाकांक्षा ने हाशिये पर पड़ी कांग्रेस को फिर से खड़ा कर दिया। … बिहार में महागठबंधन फिर तैयार है और कोई आश्चर्य नहीं, यदि आने वाले लोकसभा चुनाव में एनडीए बिहार में पटखनिया खा जाये। […]Continue Reading
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प्रियंका गांधी के उत्तर प्रदेश में तूफानी अंदाज में एंट्री लेने के साथ ही यह सवाल शुरू हो गया कि रैली चाहे जितनी ही कामयाब हो मगर राज्य में संगठन कहां है? और बिना संगठन के कांग्रेस उत्तर प्रदेश में कैसे कामयाब होगी? दरअसल इस सवाल के जवाब में ही भारतीय राजनीति का तिलिस्म छिपा […]Continue Reading
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अमीर ‘मध्यमवर्गीय टाइप’ किसी बात पर कभी अपनी व्यथा तो छोड़ो प्रतिक्रिया भी देना शान के खिलाफ मानते हैं। सरकार या सिस्टम कोई भी कदम उठाये उनकी सेहत पर कोई विपरीत असर नहीं पड़ता है। जैसे हाथी कितना भी दुबला हो जाये रहेगा तो हाथी ही। उसी तरह अमीर पर सरकार कितने भी सर चार्ज […]Continue Reading
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जैसे जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं वैसे वैसे राफेल सौदे को लेकर नए खुलासे हो रहे हैं और विपक्षी पार्टियों खास कर कांग्रेस की तल्खी बढ़ती जा रही है। राफेल मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद लग रहा था कि अब यह मामला थम जाएगा क्योंकि सर्वोच्च अदालत ने अपने सामने रखे […]Continue Reading
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मुंबई में महिला कांग्रेस की उभरती नेता भावना जैन ‘बदलती’ कांग्रेस पार्टी का नया चेहरा हैं। जुहू की कच्ची बस्ती नेहरू नगर में लोगों के बीच खड़ी वो दूर से पहचानी जा सकती हैं। उनका अंदाज़ आक्रामक है, ‘ये वाली सड़क बनानी चाहिए न पूरी’। उनके हाव-भाव में आत्मविश्वास है। नेहरू नगर में पार्टी के […]Continue Reading
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इस बात पर गौर कीजिए। वित्त मंत्रालय ने काले धन पर उन तीन रिपोर्टों को सार्वजनिक करने से मना कर दिया है, जिनमें देश के भीतर और विदेश में भारतीयों के कालाधन रखने से जुड़ी जानकारी दर्ज है। केंद्र सरकार के पास ये रिपोर्ट जमा हुए चार साल से ज़्यादा वक़्त बीत चुके हैं। लेकिन […]Continue Reading
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अफगानिस्तान में अमन मुमकिन?अमेरिका ने अफगानिस्तान में शांति समझौता कराने में अपनी ताकत झोंकी है। उसका मकसद अमेरिकी सैनिकों को वापस घर लाने के लायक स्थिति बनाना है। मगर भारत ने उसे तालिबान के साथ हड़बड़ी में शांति संधि करने पर चेतावनी दी है। भारत का कहना है कि तालिबान के साथ किसी भी संधि में अफगानिस्तान की मौजूदा राजनीतिक और संवैधानिक संरचना की सुरक्षा होनी चाहिए। भारत चुनाव से पहले किसी अंतरिम सरकार के गठन के पक्ष में नहीं है। भारत ने ये बातें अमेरिकी दूत जालमाय खालिदजाद को उनके नई दिल्ली दौरे पर कही। अफगान सरकार और तालिबान के बीच बातचीत पर सालों तक जोर देते रहने के बाद अमेरिका ने सितंबर में खालिदजाद को अफगान दूत नियुक्त किया था। उसके फौरन बाद उन्हृोंने विद्रोहियों से बातचीत शुरू कर दी जो अफगान सरकार को अमेरिका की कठपुतली बताते हैं। लेकिन बहुत से विश्लेषकों को डर है कि नाटो सैनिकों की पूरी वापसी के बाद अफगानिस्तान की कमजोर और भ्रष्ट सरकार चरमरा पर गिर सकती है या नए गृहयुद्ध की शुरुआत हो सकती है। विश्लेषकों का कहना है कि तालिबान ताकतवर होकर वार्ता की मेज पर आया है। उसने देश के करीब आधे हिस्से पर नियंत्रण स्थापित कर लिया है। अब समझा यह जा रहा है कि दोनों पक्ष सहमति की ओर बढ़ रहे हैं, जिसके तहत आतंकवादी हमलों के लिए इस्तेमाल न होने के तालिबान के वादे के एवज में अमेरिका अफगानिस्तान से वापस हट जाएगा। अफगानिस्तान की मौजूदा सरकार नस्लीय और गुटों के आधार पर विभाजित है। उसकी सत्ता मुख्य रूप से शहरों में केंद्रित है, जबकि देहाती इलाकों में व्यापक रूप से तालिबान का वर्चस्व है। अमेरिका और नाटो ने 2014 में अपनी लड़ाकू भूमिका खत्म करने की घोषणा की थी, लेकिन अभी भी वह अफगान सेना को हवाई और रणनीतिक समर्थन दे रही है। अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी देश में अंतरिम सरकार बनाने के सख्त खिलाफ हैं। मगर इस समय चल रही बातचीत में उन्हें दरकिनार कर दिया गया है। अफगानिस्तान दशकों से युद्ध का सामना कर रहा है। हालांकि पिछली वार्ताओं में अमेरिका और तालिबान दोनों ने ही अहम प्रगति की बात की है, लेकिन अभी तक कोई समझौता नहीं हुआ है। ये कहना जल्दबाजी होगी कि क्या तालिबान दूसरे हथियारबंद गुटों पर कार्रवाई करने का इच्छुक है और इसमें समर्थ भी है। बहरहाल, ताजा अमेरिकी रुख भारत के लिए एक चुनौती है। बेहतर होगा कि भारत जल्द-से-जल्द अपनी स्पष्ट अफगान नीति घोषित करे।

अमेरिका ने अफगानिस्तान में शांति समझौता कराने में अपनी ताकत झोंकी है। उसका मकसद अमेरिकी सैनिकों को वापस घर लाने के लायक स्थिति बनाना है। मगर भारत ने उसे तालिबान के साथ हड़बड़ी में शांति संधि करने पर चेतावनी दी है। भारत का कहना है कि तालिबान के साथ किसी भी संधि में अफगानिस्तान की […]Continue Reading
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भारतीय जनता पार्टी सभी विपक्षी पार्टियों को भ्रष्ट बता कर लोकसभा चुनाव लड़ने उतर रही है। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा से प्रवर्तन निदेशालय की पूछताछ को भाजपा ने बड़ा मुद्दा बनाया है। सोशल मीडिया में चल रहे प्रचार को भाजपा के प्रवक्ता ने प्रेस कांफ्रेंस में दोहराया। उन्होंने कहा कि प्रियंका […]Continue Reading