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आशीष बेतरह उदास था. मां की तस्वीर के आगे चुपचाप सिर झुकाए बैठा था. बार-बार आंखें आंसुओं से छलछला उठती थीं. बाइस साल के इकलौते बेटे को डॉक्टर बनाने का सपना पाले मां ने अचानक ही आंखें मूंद ली थीं. उनके जाने का किसी को यकीन ही नहीं हो रहा था. न आशीष को, न […]Continue Reading
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आशीष बेतरह उदास था. मां की तस्वीर के आगे चुपचाप सिर झुकाए बैठा था. बार-बार आंखें आंसुओं से छलछला उठती थीं. बाइस साल के इकलौते बेटे को डॉक्टर बनाने का सपना पाले मां ने अचानक ही आंखें मूंद ली थीं. उनके जाने का किसी को यकीन ही नहीं हो रहा था. न आशीष को, न […]Continue Reading
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राहे-मोहब्बत तपती भूमि, जिस्मो-जान पिघलते हैं आज वफ़ा के मारे राही अंगारों पर चलते हैं. मेरे मन के नील गगन का रंग कभी ना बदलेगा देखें तेरे रूप के बादल कितने रंग बदलते हैं. देख रहे हैं सांझ-सवेरे दिलवालों की बस्ती से अरमानों की लाशें ले कर कितने लोग निकलते हैं. खुशियों के परबत पर […]Continue Reading
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उस कौफी शाप में बैठी मैं बड़ी देर से दरवाजे के बाहर आते जाते कदमों को देख रही थी. कदमों को पढ़ना भी एक कला है. दिल्ली की बसों या मेट्रो में लोगों के चेहरों को पढ़ना भी मेरी आदत में शुमार है. मैं चेहरे देख कर व्यक्ति के व्यवहार, पीड़ा या खुशी का अंदाजा […]Continue Reading
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अर्शी की आए-दिन मियां से लड़ाई हो जाती है. झगड़ा इतना बढ़ जाता है कि अर्शी सोचने लगती कि इस आदमी के साथ पूरी जिन्दगी कैसे काटेगी. डर लगता है कि कहीं किसी दिन आदिल उसे तलाक ही न दे दे. बड़ी असुरक्षित सी जिन्दगी जी रही थी. हर वक्त सीने में धुकधुकी सी लगी […]Continue Reading
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लब मेरे खामोश रहेंगे क्योंकि मेरा प्यार हो तुम वरना मेरा दिल जाने है झूठे और मक्कार हो तुम फूलों सी मुस्कान में लिपटा शबनम भीगा प्यार तेरा जैसे मतलब निकल गया तो बरछी और कटार हो तुम बंट जाते हो सब लोगों में मुझको तनहा छोड़ के तुम मैं झूठे कहती रहती हूं के […]Continue Reading
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आदिल खान परेशान थे. कई बार अब्बा के पास आकर अपना दुखड़ा रो चुके थे. परेशानी थी एक पीपल का पेड़, जो उनके घर के ठीक पीछे अपनी जड़ें गहरी कर उनकी पूरी छत पर अपनी टहनियां फैला चुका था. उनके घर के पीछे की जमीन नगर निगम की थी, जहां कोई निर्माणकार्य नहीं हो […]Continue Reading
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कल की सियाह रात का चर्चा किये बगैर जायेंगे नहीं चांद से शिकवा किये बगैर अब देखिये लेते हैं वो किस किस से दुश्मनी महफ़िल में आ गये जो हम पर्दा किये बगैर दीवानों सी सूरत लिए फिरते हैं शहर में मानेंगे नहीं वो हमें रुसवा किये बगैर क्या क्या न गज़ब हो गया काफ़िर […]Continue Reading
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उसके लिए ज़िदगी खुला आसमान बे-छोर, बे-बंधन, बे-छत, बे-दीवार खेलो-खाओ, पियो-जियो मेरे लिए ज़िदगी कल्पना नहीं, नशा नहीं, स्वप्न नहीं सिर्फ हकीकत मुश्किलों का सामना करती जूझती, लड़ती , आगे बढ़ती बंधनों के साथ, दायरों के साथ वो समझौतों से परे, मैं समझौतों के साथ दोनों विपरीत, दोनों भिन्न ख़याल भिन्न, व्यवहार भिन्न, परिस्थितियां भिन्न […]Continue Reading
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पुरवा का पर्स चोर से वापस लाने में सुहास मदद करता है. इस तरह दोनों की जानपहचान होती है और मुलाकातें बढ़ कर प्यार में बदल जाती हैं. सुहास पुरवा को अपने घर ले जाता है. वह अपनी मां रजनीबाला और बहन श्वेता से उसे मिलवाता है. रजनीबाला को पुरवा अच्छी लगती है. उधर पुरवा […]Continue Reading