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साक्षात्कार

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तीसरे चरण में सपा−बसपा गठबंधन की मजबूती के साथ परिवारिक रिश्तों की परख होगी। मायावती ने मैनपुरी में मुलायम के साथ मंच साझा करने के साथ उनके समर्थन में वोट मांगने की अपील करके यह जता दिया है कि उन्होंने पुरानी बातों पर राख डाल दी है। उत्तर प्रदेश में 23 अप्रैल को तीसरे चरण […]Continue Reading
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1993 में हुए विधानसभा चुनाव में सपा को 109 और बसपा को 67 सीटें हासिल हुई। वैसे तो सपा-बसपा दोनों का आंकड़ा मिलकर सिर्फ 176 तक ही पहुंच पाया था जो कि बहुमत से काफी दूर था लेकिन इसने अपने गठबंधन से एक सीट ज्यादा यानी 177 सीट जीतने वाली बीजेपी को भी सत्ता से […]Continue Reading
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आजम की बदजुबानी हमेशा सुर्खियों में रहती है। आजम ने जयाप्रदा को आहत किया है तो इससे पहले भी उनकी विवादित बयानबाजी से कई हस्तियां आहत हो चुकी हैं। यहां तक की जिन मुलायम सिंह यादव ने आजम को सियासत की एबीसीडी सिखाई थी, उन्हीं मुलायम सिंह से जब अमर सिंह को लेकर आजम खान […]Continue Reading
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आम भारतीय लोगों में लोकतंत्र एवं लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति संतुष्टि एवं निष्ठा का स्तर दुनिया के तमाम विकसित देशों से ज्यादा है। मगर लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुनाव प्रक्रिया को संचालित करने में राजनेताओं की निष्ठा का गिरता स्तर घोर चिन्तनीय है। सत्रहवीं लोकसभा के लिये जारी चुनाव अभियान में चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन […]Continue Reading
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चुनाव आयोग ने जो 48 से 72 घंटों तक इन नेताओं के चुनाव प्रचार करने पर प्रतिबंध लगाकर जो “सख्ती” दिखाई है वो कितनी असरदार रही ये तो चुनाव आयोग के इस “सख्त फैसले” के तुरंत बाद नवजोत सिंह सिद्धू के बयानों ने साफ कर दिया है। कुछ समय पहले अमेरिका के एक शिखर के […]Continue Reading
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हर चुनाव की तरह इस आम चुनाव को भी भारत का भविष्य गढ़ने वाला बताया जा रहा है। राजनीतिक पार्टियों का जोर न तो राष्ट्रीय सुरक्षा पर है, न रोजगार पैदा करने वाले आर्थिक विकास पर एवं न सुदृढ़ भारत निर्मित करने पर है। सभी का जोर येन-केन-प्रकारेण सत्ता हासिल करने का है। आम चुनाव […]Continue Reading
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आखिर क्या कारण है कि भारत विश्व की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बाद भी अपने लोगों को खुशी नहीं दे पा रहा है। नेताओं के द्वारा देश के विकास व जन जीवन के सुधार की घोषणाओं व भाषणों के बाद भी लोगों को खुशी हासिल क्यों नहीं हो पा रही हैं। देश के […]Continue Reading
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भारत में गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा आमतौर पर नहीं मिल पाती। इसका अभाव मरीजों के अत्यधिक बोझ से दबे सरकारी अस्पतालों में तो है ही, ताम-झाम वाले निजी अस्पतालों में भी है, जहां पर रोगियों से ज्यादा महत्व अस्पताल के आर्थिक मुनाफे को दिया जाता है। पिछले हफ्ते दांत-दर्द से परेशान मेरे एक दोस्त ने दर्दनिवारक […]Continue Reading
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अब जबकि भारत में चुनावी माहौल अपनी गति पकड़ चुका है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इर्द-गिर्द ही लोकसभा चुनाव सिमटता दिख रहा है। यह तो 23 मई को पता चलेगा कि वह फिर से जनादेश पाने में सफल हुए हैं या नहीं, लेकिन भारत की विदेश नीति को नया रूप देने में पिछली सरकार जरूर […]Continue Reading
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इस समय पूरे देश में चुनाव और राजनीति की ही चर्चा है। लेकिन दुख की बात है कि लोगों के दीर्घकालिक हितों से जुड़े कई जरूरी मसले अब भी हमारे चुनावी विमर्श से बाहर हैं। नदियों की दुर्दशा ऐसा ही एक मुद्दा है। हालांकि आम जनता भी तात्कालिक लाभ की पूर्ति हो जाने या उसकी […]Continue Reading